ध्वनि प्रदूषण पर कोर्ट की सख्ती के मायने

सवाल यह है कि ध्वनि प्रदूषण पर हाई कोर्ट को ऐसा आदेश क्यों देना पड़ा? क्या सरकार और अफसरशाही ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है? क्या अफसरशाही की सक्रियता और लोगों की जागरूकता के बिना ध्वनि प्रदूषण को रोका जा सकता है? प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड क्या कर रहा है? क्या कोर्ट के आदेशों को जमीन पर उतारने की उम्मीद की जा सकती है?

Sanjay Sharma

शहरों में लगातार बढ़ रहे ध्वनि प्रदूषण पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बार फिर सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने न केवल डीजे बजाने पर रोक लगा दी है बल्कि सरकार को इस पर कड़ाई से नियंत्रण लगाने को कहा है। कोर्ट ने शहरों को औद्योगिक, व्यावसायिक और रिहायशी या साइलेन्स जोन में बांटने और जिलाधिकारियों को टीम बनाकर ध्वनि प्रदूषण की निगरानी करने व दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने का भी आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून का उल्लंघन करने पर पांच साल तक की कैद व एक लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। सवाल यह है कि ध्वनि प्रदूषण पर हाई कोर्ट को ऐसा आदेश क्यों देना पड़ा? क्या सरकार व अफसरशाही ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है? क्या अफसरशाही की सक्रियता और लोगों की जागरूकता के बिना ध्वनि प्रदूषण को रोका जा सकता है? प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड क्या कर रहा है? क्या कोर्ट के आदेशों को जमीन पर उतारने की उम्मीद की जा सकती है? क्या लोगों के मौलिक अधिकारों और उनकी सेहत की सुरक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है?
ध्वनि विस्तारक यंत्रों, कल-कारखानों और वाहनों से होने वाले शोर के कारण शहरों में ध्वनि प्रदूषण बेकाबू होता जा रहा है। लखनऊ में औसत 50 से 75 डेसीबल के बीच शोर रहता है। सडक़ों पर यह शोर और अधिक हो जाता है। डीजे से होने वाला शोर 150 डेसीबल तक होता है। यह निर्धारित मानक से बहुत अधिक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 45 डेसीबेल से अधिक शोर नुकसानदायक होता है। हैरानी की बात यह है कि ध्वनि प्रदूषण पर बना कानून रेग्यूलेशन एंड कंट्रोल 2000 होने के बावजूद स्थितियों पर नियंत्रण नहीं लग पा रहा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई करता नहीं दिख रहा है। हकीकत यह है कि मजबूत इच्छाशक्ति का अभाव और अफसरों के लापरवाहीपूर्ण रवैए के कारण ध्वनि प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। लिहाजा कोर्ट को जनहित में सरकार को आदेश पर आदेश जारी करने पड़ रहे हैं। दो वर्ष पहले भी इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने प्रदेश सरकार को ध्वनि प्रदूषण को लेकर सख्ती बरतने का आदेश दिया था लेकिन वह ठंडे बस्ते में चला गया। ध्वनि प्रदूषण कितना घातक है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसके कारण मनुष्य में चिड़चिड़ापन आ जाता है और उसके सुनने की शक्ति कम हो जाती है। दीर्घ अवधि तक ध्वनि प्रदूषण के कारण न्यूरोटिक मेंटल डिसार्डर हो सकता है। इससे उच्च रक्तचाप, तनाव और पाचन तंत्र की गड़बड़ी हो जाती है। यदि सरकार लोगों को ध्वनि प्रदूषण से मुक्त रखना चाहती है तो उसे हाई कोर्ट के निर्देशों और इसके नियंत्रण के लिए बने कानूनों का पालन कराना सुनिश्चित करना होगा। साथ ही लोगों को भी जागरूक करना होगा ताकि वे ध्वनि विस्तारक यंत्रों का प्रयोग करने से बचें। साथ ही दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी करनी होगी।

 

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