हर बार बाढ़ से हाहाकार क्यों?

  • सवाल यह है कि हर साल बारिश के समय देश में बाढ़ से हाहाकार क्यों मचता है? क्या इससे निपटने के लिए सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं है? क्या हर साल होने वाले जन-धन के नुकसान को रोका नहीं जा सकता है? क्या अनियोजित विकास और पर्यावरण के क्षरण ने इस विनाश को बढ़ा दिया है? जीवनदायिनी नदियां तांडव क्यों कर रही हैं? क्या इसका स्थायी हल नहीं निकाला जा सकता है?

Sanjay Sharma

आधा हिंदुस्तान बाढ़ की चपेट में है। लाखों लोग प्रभावित हैं। अरबों की संपत्ति नष्टï हो चुकी है। तीन सौ लोगों की मौत हो चुकी है। हाहाकारी नदियों के आगे राहत और बचाव कार्य नाकाफी साबित हो रहे हैं। सवाल यह है कि हर साल बारिश के समय देश में बाढ़ से हाहाकार क्यों मचता है? क्या इससे निपटने के लिए सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं है? क्या हर साल होने वाले जन-धन के नुकसान को रोका नहीं जा सकता है? क्या अनियोजित विकास और पर्यावरण के क्षरण ने इस विनाश को बढ़ा दिया है? जीवनदायिनी नदियां तांडव क्यों कर रही हैं? क्या इसका स्थायी हल नहीं निकाला जा सकता है? क्या तालाबों, पोखरों और कुंओं के समाप्त होते अस्तित्व ने स्थितियों को और भी विनाशकारी बना दिया है? क्या प्रकृति के प्रति बदलते दृष्टिïकोण से हालात बेकाबू हो चुके हैं?
भारत के लोग हर साल बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा का सामना करने के लिए अभिशप्त हैं। पहाड़ी इलाकों में बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। मैदानी इलाकों में नदिया साल-दर-साल और भी विनाशकारी होती जा रही हैं। अरबों की संपत्ति नष्टï हो जाती है। खेतों में खड़ी फसलें तबाह हो जाती है। इसकी चपेट में आकर पशु और आदमी मौत के मुंह में समा जाते हैं और बाढ़ का पानी उतरने के बाद प्रभावित इलाके में महामारी फैलती है। ये स्थितियां अचानक नहीं उत्पन्न हुई हैं। शहरीकरण ने प्रकृति के ताने-बाने को नष्टï कर दिया है। अधिकांश पोखर, तालाब और कुंए पाट दिए गए हैं। उन पर बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी कर दी गई हैं। पेड़ों के अंधाधुंध कटान के कारण पहाड़ कमजोर हो चुके हैं। नदियां अपने साथ मिट्टी और रेत बहाकर लाती हैं। इसे वह अपने तल पर छोड़ देती हैं। इससे नदियों के जल धारण की क्षमता कम हो गई है। शहर का सारा पानी भी इन्हीं नदियों में गिराया जाता है। ऐसी स्थिति में थोड़ी सी बारिश में भी बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। रही सही कसर बांध पूरा कर देते हैं। क्षमता से अधिक पानी होने पर बांधों के गेट खोल दिए जाते हैं। यह पानी जैसे ही नदी में पहुंचता है, वह विनाशकारी हो जाता है। बाढ़ से हर साल न केवल अरबों रुपये का नुकसान होता है बल्कि राहत और बचाव कार्य में भी सरकार को भारी धनराशि खर्च करनी पड़ती है। इसका देश के विकास पर नकारात्मक असर पड़ता है। सरकार यदि इस समस्या से निपटना चाहती है तो उसे न केवल नदियों के तल को साफ कराना होगा बल्कि पोखरों और तालाबों को संरक्षित भी करना होगा। जल संरक्षण को बढ़ावा देना होगा। इसके अलावा पहाड़ों पर सघन वृक्षारोपण कराना होगा। साथ ही शहरीकरण के दौरान पर्यावरण संरक्षण को केंद्र में रखना होगा।

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