सुप्रीम कोर्ट का आदेश और सरकार की साख

सवाल यह है कि आखिर शीर्ष अदालत को इस मामले में दखल क्यों देना पड़ा? क्या कोर्ट के आदेश ने प्रदेश सरकार और पुलिस तंत्र की साख को कठघरे में नहीं खड़ा कर दिया है? क्या पुलिस की लापरवाही ने सरकार की एक बार फिर किरकिरी नहीं करा दी? क्या सियासी संरक्षण के कारण स्थिति बेकाबू हो गई? पीडि़त परिवार की चिट्ठी कोर्ट तक क्यों नहीं पहुंची?

Sanjay Sharma

उन्नाव रेप और दुष्कर्म पीडि़ता हादसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने इस मामले के सभी केस दिल्ली कोर्ट में ट्रांसफर करने, 45 दिन के भीतर सुनवाई पूरी करने और सीबीआई को एक सप्ताह में हादसे की जांच रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने पीडि़ता की सुरक्षा की जिम्मेदारी सीआरपीएफ को दी है। वहीं यूपी सरकार से पीडि़त परिवार को 25 लाख का मुआवजा तत्काल देने को कहा है। सवाल यह है कि आखिर शीर्ष अदालत को इस मामले में दखल क्यों देना पड़ा? क्या कोर्ट के आदेश ने प्रदेश सरकार और पुलिस तंत्र की साख को कठघरे में नहीं खड़ा कर दिया है? क्या पुलिस की लापरवाही ने सरकार की एक बार फिर किरकिरी नहीं करा दी? क्या सियासी संरक्षण के कारण स्थिति बेकाबू हो गई? पीडि़त परिवार की चिट्ठी कोर्ट तक क्यों नहीं पहुंची? स्थानीय पुलिस तंत्र ने पीडि़ता की मदद क्यों नहीं की? क्या सरकार इससे कोई सबक सीखेगी?
उन्नाव कांड उस समय शुरू हुआ जब 2017 में एक किशोरी ने भाजपा के विधायक रहे कुलदीप सिंह सेंगर पर रेप का आरोप लगाया। सेंगर पर यह भी आरोप है कि उसने रेप पीडि़ता के पिता को पिटवाया व जेल भिजवा दिया। उनकी जेल में ही मौत हो गई। सीबीआई जांच में पता चला था कि पुलिस ने पीडि़ता के पिता को झूठे मुकदमे में फंसाया था। आरोपी विधायक तब से जेल में बंद है। इस दौरान परिजनों ने पुलिस से विधायक के करीबी व गुर्गों द्वारा केस वापस लेने वरना अंजाम भुगतने की धमकी देने की शिकायत की। साथ ही ऐसी एक चिट्ठी चीफ जस्टिस को भी भेजी थी। इसी बीच पीडि़ता हादसे का शिकार हो गई। इसमें पीडि़ता के दो रिश्तेदारों की मौत हो गई जबकि वह और उसके वकील की हालत नाजुक है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल दिया है। चीफ जस्टिस ने चिट्ठी न मिलने पर नाराजगी जताई है। कोर्ट के आदेश ने सरकार व पुलिस की साख पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। यदि पुलिस पीडि़ता की शिकायत को गंभीरता से लेती तो यह नौबत नहीं आती। परिजनों का आरोप है कि यह हादसा नहीं बल्कि पीडि़ता को मारने की साजिश थी। पीडि़ता की सुरक्षा सीआरपीएफ को सौंप कर कोर्ट ने साफ कर दिया है कि उसे यूपी पुलिस पर भरोसा नहीं है। सीबीआई जांच में भी विधायक व पुलिस की मिलीभगत उजागर हो चुकी है। हैरानी की बात यह है कि रेप मामले में सीबीआई अभी तक चार्जशीट नहीं दाखिल कर सकी है। वहीं चीफ जस्टिस तक एक आम आदमी की चिट्ठी का न पहुंचना व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। कोर्ट के इस रुख से प्रदेश सरकार व पुलिस दोनों को सबक लेने की जरूरत है।

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