हर बात पर हड़ताल और सरकार का रवैया

सवाल यह है कि देश में बात-बात पर हड़ताल की प्रवृत्ति बढ़ती क्यों जा रही है? क्या बातचीत से समस्या के समाधान के रास्ते बंद हो चुके हैं? क्या सरकार इन हड़तालों से होने वाली परेशानी को लेकर गंभीर नहीं है? क्या अफसरशाही की लापरवाही के चलते ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो रही हैं? क्या लोगों की समस्याओं का हल निकालना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है?

Sanjay Sharma

एनएमसी यानी नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल के विरोध में देश भर में चिकित्सकों ने हड़ताल कर दी। अस्पतालों में काम-काज ठप हो गया। मरीज और तीमारदार परेशान रहे। सबसे अधिक परेशानी गंभीर रोगियों को उठानी पड़ी। वे इलाज के लिए भटकते रहे। सवाल यह है कि देश में बात-बात पर हड़ताल की प्रवृत्ति बढ़ती क्यों जा रही है? क्या बातचीत से समस्या के समाधान के रास्ते बंद हो चुके हैं? क्या सरकार इन हड़तालों से होने वाली परेशानी को लेकर गंभीर नहीं है? क्या अफसरशाही की लापरवाही के चलते ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो रही हैं? क्या लोगों की समस्याओं का हल निकालना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है? क्या चिकित्सकों को मरीजों का ख्याल नहीं रखना चाहिए? क्या मरीजों के प्रति उनकी कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती है?
कुछ वर्षों में देश में हड़ताल और प्रदर्शन की बाढ़ सी आ गई है। एक हड़ताल खत्म नहीं होती दूसरी शुरू हो जाती है। यहां बात-बात पर प्रदर्शन होने लगते हैं। ये प्रदर्शन कई बार उग्र और हिंसक हो जाते हैं। इससे न केवल सरकारी संपत्ति का नुकसान होता है बल्कि जनता को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। अब एनएमसी के विरोध में चिकित्सक सडक़ पर उतर आए हैं। प्रदेश की राजधानी लखनऊ पर भी इसका असर पड़ा। यहां के तमाम सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों ने कार्य बहिष्कार कर दिया। इसके कारण मरीजों को इलाज नहीं मिल सका। वे तड़पते रहे। वहीं चिकित्सक का तर्क है कि इस बिल के पास हो जाने के बाद साढ़े तीन लाख नॉन मेडिकल लोगों को लाइसेंस दे दिया जाएगा। लाइसेंस मिलने से इनको सभी प्रकार की दवाइयां लिखने और इलाज करने का अधिकार मिल जाएगा। इसके कारण चिकित्सा के क्षेत्र में गिरावट आएगी। ऐलोपैथिक, होम्योपैथिक और आयुर्वेदिक दवाओं का मिश्रण हो जाएगा। निजी मेडिकल कॉलेजों की 50 फीसद सीट सरकार के नियंत्रण में रहेगी जिससे मेडिकल की पढ़ाई और महंगी हो जाएगी। चिकित्सकों के तर्कों में दम है। बावजूद इसके चिकित्सकों को वार्ता के जरिए इस समस्या का समाधान खोजना चाहिए था। हड़ताल किसी समस्या का हल नहीं है। वहीं चिकित्सकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके ऊपर लोगों की चिकित्सा जैसी गंभीर जिम्मेदारी है। नैतिक आधार पर भी चिकित्सकीय सेवा को ठप कर हड़ताल करने को उचित नहीं ठहराया जा सकता है। इससे तमाम लोगों को परेशानी उठानी पड़ती है। दूसरी ओर सरकार को भी चाहिए कि वह चिकित्सकों की वाजिब चिंता को समझे। उनके साथ वार्ता कर समस्या का समाधान निकाले। अन्यथा हड़तालों से देश को मुक्ति नहीं मिलेगी।

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