तीन तलाक बिल के पास होने के निहितार्थ

सवाल यह है कि देश में व्याप्त इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए सरकार को इतनी मशक्कत क्यों करनी पड़ी? कांग्रेस समेत कई सियासी दल इसका विरोध क्यों कर रहे हैं? क्या वोट बैंक की राजनीति के कारण विरोधी दल इसका विरोध करते रहे? क्या इससे महिला सशक्तिकरण आंदोलन को और मजबूती मिलेगी? क्या यह बिल मुस्लिम महिलाओं को संरक्षण प्रदान करने में सफल होगा?

Sanjay Sharma

आखिरकार तीन तलाक को संज्ञेय अपराध घोषित करने वाला ऐतिहासिक बिल राज्य सभा में भी पास हो गया। मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक के पक्ष में 99 जबकि विरोध में 84 वोट पड़े। बीएसपी, पीडीपी, टीआरएस, जेडीयू, एआईएडीएमके और टीडीपी जैसे कई दलों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया। राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद यह विधेयक तीन तलाक को लेकर 21 फरवरी को जारी किए गए मौजूदा अध्यादेश की जगह ले लेगा। सवाल यह है कि देश में व्याप्त इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए सरकार को इतनी मशक्कत क्यों करनी पड़ी? कांग्रेस समेत कई सियासी दल इसका विरोध क्यों कर रहे हैं? क्या वोट बैंक की राजनीति के कारण विरोधी दल इसका विरोध करते रहे? क्या इससे महिला सशक्तिकरण आंदोलन को और मजबूती मिलेगी? क्या यह बिल मुस्लिम महिलाओं को संरक्षण प्रदान करने में सफल होगा?
तीन तलाक को खत्म करने को लेकर मोदी सरकार गंभीर रही है। इस कुप्रथा को अपराध घोषित करने के लिए सरकार ने कई बार प्रयास किये। सदन में घंटों बहस चली। कई संशोधन किए गए। यह बिल तीन बार लोक सभा में पास हो गया लेकिन बहुमत नहीं होने के कारण राज्य सभा से पास नहीं हो सका। लिहाजा सरकार ने इसे रोकने के लिए अध्यादेश का सहारा लिया। खुद सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रथा को असंवैधानिक करार दिया था और संसद से कानून बनाने को कहा था। बावजूद विरोधी दल इसको समाप्त करने के पक्ष में नहीं थे। इसे कुप्रथा मानने के बावजूद विपक्षी दल किंतु-परंतु करते रहे। सच यह है कि वे इसके पक्ष में दलील देकर अपनी सियासी रोटियां सेंकने की कोशिश करते रहे । बावजूद इसके सरकार की कोशिशों से बिल पास हो गया। अब कोई भी मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को तीन बार तलाक बोलकर तलाक नहीं दे सकेगा। ऐसा करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। इसे संज्ञेय अपराध घोषित कर दिया गया है यानी पुलिस बिना वारंट के ऐसा करने वाले को गिरफ्तार कर सकती है। साथ ही तीन साल तक की सजा का प्रावधान भी किया गया है। हालांकि मजिस्ट्रेट आरोपी को जमानत और पीडि़ता के अनुरोध पर समझौते की मंजूरी दे सकता है। इसके अलावा पीडि़ता पति से गुजारा भत्ते का दावा भी कर सकती है। इस बिल का पास होना सरकार के लिए बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि है। इसमें दो राय नहीं कि इस बिल से देश में सदियों से चली आ रही एक कुप्रथा का अंत हो जाएगा। वहीं यह बिल संविधान में प्रदत्त लैंगिक समानता के अधिकारों को भी पोषित करेगा। यह बिल निश्चित रूप से मुस्लिम महिलाओं के जीवन में दूरगामी असर डालेगा।

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