बच्चों के यौन उत्पीडऩ पर कोर्ट की चिंता के निहितार्थ

सवाल यह है कि बच्चों के यौन उत्पीडऩ को रोकने के लिए बनाए गए कड़े कानून व फास्ट ट्रैक कोर्ट भी इस पर अंकुश क्यों नहीं लगा पा रहे हैं? क्या अपराधियों को कानून का खौफ नहीं है? क्या पुलिस के ढीले रवैए ने अपराधियों के हौसलों को बुलंद कर दिया है? क्या नैतिक मूल्य और समाज का ताना-बाना ध्वस्त हो चुका है? क्या मासूमों को दरिंदगी से बचाने में सरकार नाकाम है?

Sanjay Sharma

देश में बच्चों के यौन उत्पीडऩ की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सुप्रीम कोर्ट भी आंकड़ों को देखकर आहत है। कोर्ट ने इसे स्वत: संज्ञान लिया है। सवाल यह है कि बच्चों के यौन उत्पीडऩ को रोकने के लिए बनाए गए कड़े कानून व फास्ट ट्रैक कोर्ट भी इस पर अंकुश क्यों नहीं लगा पा रहे हैं? क्या अपराधियों को कानून का खौफ नहीं है? क्या पुलिस के ढीले रवैए ने अपराधियों के हौसलों को बुलंद कर दिया है? क्या नैतिक मूल्य और समाज का ताना-बाना ध्वस्त हो चुका है? क्या मासूमों को दरिंदगी से बचाने में सरकार नाकाम है? इन घटनाओं से मासूमों के दिल व दिमाग पर लगने वाले आघातों के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या बच्चों के यौन उत्पीडऩ की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता से सरकार कोई सबक लेगी? जनहित के मुद्दों पर कोर्ट को ही निर्देश क्यों देना पड़ता है?
बच्चों के यौन उत्पीडऩ के आंकड़े भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं। 1994 से 2016 के बीच बच्चों से दुष्कर्म की घटनाओं में 400 फीसदी का इजाफा हुआ है। ऐसा तब है जब कई घटनाओं की रिपोर्ट दर्ज नहीं है या दर्ज नहीं कराई गई है। बच्चों के यौन उत्पीडऩ में यूपी 3457 मुकदमों के साथ सबसे ऊपर है। इन मुकदमों को लेकर यूपी पुलिस की कार्रवाई बेहद सुस्त है। 50 फीसदी से अधिक केसों में जांच बेहद धीमी है। वहीं मध्यप्रदेश 2389 मामलों के साथ दूसरे नंबर पर है। ये आंकड़े सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जुटाए गए थे। देश में पिछले छह महीने में बच्चों से दुष्कर्म के 24 हजार मामले दर्ज किए गए हैं। इसमें महज चार फीसदी यानी 911 मामलों का निपटारा किया गया है। लापरवाही का आलम यह है कि अभी तक केवल 6449 मामलों में ट्रायल शुरू किया जा सका है। शेष में जांच चल रही है या चार्जशीट पेश की गई है। यह स्थिति तब है जब बच्चों के साथ रेप के मामले पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज किए जाते हैं। इस कानून में दोषियों के लिए 10 साल से लेकर आजीवन उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है। हालांकि हाल में सरकार ने अब बच्चों के साथ यौन अपराध करने वालों को फांसी की सजा का प्रावधान किया है। असली आंकड़े इससे अधिक हैं। नेशनल अकादमी ऑफ साइकोलॉजी के मुताबिक दो तिहाई बच्चे अपने साथ हुई यौन शोषण की जानकारी साझा नहीं करते हैं। इसमें 93 फीसदी यौन शोषण का शिकार बच्चियां ग्रामीण इलाकों की है। सरकार को चाहिए कि वह ऐसे मामलों के त्वरित निपटारे के लिए न केवल फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या में वृद्धि करे बल्कि अदालतों में जजों की पर्याप्त संख्या बढ़ाए। इससे अपराधी को जल्द दंड दिया जा सकेगा अन्यथा अपराधी खुलेआम समाज में मासूमों को शिकार बनाते रहेंगे।

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