जेलों में मौज काटते अपराधी और लचर तंत्र

सवाल यह है कि जेलों में इन अपराधियों को ऐशो-आराम की जिंदगी के साधन कौन मुहैया करा रहा है? क्या अपराधियों के आगे जेल प्रशासन घुटने टेक चुकाहै या सब कुछ मिलीभगत से चल रहा है? क्या पैसे के बल पर अपराधी मौज काट रहे हैं? जेल के भीतर प्रतिबंधित वस्तुएं कैसे पहुंच रही हैं?

Sanjay

तमाम दावों के बावजूद प्रदेश की जेलें अपराधियों की आरामगाह बन गई हैं। यहां वे सजा की जगह मौज काट रहे हैं। मऊ और इटावा जेल की वायरल वीडियो इसकी पुष्टिï करते हैं। जेलों में अपराधियों को किसी का खौफ नहीं है। हालांकि अधिकारी सब कुछ दुरुस्त होने का दावा कर रहे है। सवाल यह है कि जेलों में इन अपराधियों को ऐशो-आराम की जिंदगी के साधन कौन मुहैया करा रहा है? क्या अपराधियों के आगे जेल प्रशासन घुटने टेक चुकाहै या सब कुछ मिलीभगत से चल रहा है? क्या पैसे के बल पर अपराधी मौज काट रहे हैं? जेल के भीतर प्रतिबंधित वस्तुएं कैसे पहुंच रही हैं? जेल के भीतर जुआ खेलने, हथियार लहराने और हत्या करने की हिम्मत अपराधियों को कैसे पड़ रही है? क्या भ्रष्टïाचार ने पूरे जेल प्रशासन को अपनी चपेट में ले लिया है? क्या पूरे तंत्र में आमूल परिवर्तन की जरूरत सरकार को महसूस नहीं हो रही है?
प्रदेश की जेलों में सब कुछ ठीक नहीं है। जेलों के भीतर का हाल वीडियो के जरिए बाहर आने लगा है। मऊ जेल के आधा दर्जन वीडियो वायरल हुए हैं। इन वीडियो में यहां की बैरकों में चिकन-मटन बनाने की व्यवस्था दिखाई दे रही है। अपराधी खुलेआम हेरोइन-गांजा का इस्तेमाल करते नजर आ रहे है। मोबाइल फोन का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी तरह इटावा जेल में अपराधी जुआ खेलते नजर आते हैं। हैरानी की बात यह है कि इस वीडियो में खाकी वर्दी पहने एक पुलिसवाला जुआ खेलने वालों से पैसों की वसूली कर रहा है। हकीकत यह है कि अपराधी जेल के भीतर से अपना गैंग भी चला रहे हैं। पैसे के बल पर वे जेल के भीतर सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं। यह सब बिना जेलकर्मियों की मिलीभगत के संभव नहीं है। कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिसमें कर्मियों और अपराधियों के गठजोड़ का खुलासा हुआ है। कई बार जेल में भीतर गैंगवार तक हो चुकी है। पिछले साल बागपत जेल में माफिया डान मुन्ना बजरंगी की हत्या कर दी गई थी। वहीं देवरिया जेल में छापेमारी के दौरान मोबाइल, सिम और पेन ड्राइव बरामद हुई थी। जेल के भीतर अपराधियों को बेखौफ होना खतरे की घंटी है और यह जेल प्रशासन के लचर और भ्रष्टï रवैए की ओर इशारा करता है। वहीं जेलों में खानापूर्ति के नाम पर छापेमारी की जाती है। कई बार छापेमारी की सूचना जेल में बंद अपराधियों को मिल जाती है और वे सतर्क हो जाते हैं। सरकार यदि अपराधियों पर कानून का खौफ उत्पन्न करना चाहती है तो उसे जेल प्रशासन को न केवल जवाबदेह बनाना होगा बल्कि लापरवाह और भ्रष्टï कर्मचारियों को चिन्हित कर दंडित करना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो स्थितियां कभी भी विस्फोटक हो सकती हैं।

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