उपेक्षित होते बुजुर्ग समाज और सरकार

सवाल यह है कि बुजुर्गों का सम्मान करने वाले भारतीय समाज में इतना बड़ा बदलाव कैसे आया? क्या संयुक्त परिवार की समाप्ति के साथ बुजुर्ग समाज में उपेक्षित हो गए हैं? क्या भौतिकवाद और बढ़ते एकल परिवारों ने बुजुर्गों को हाशिए पर पहुंचा दिया है? क्या वृद्धजनों के बेहतर जीवन और सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की नहीं है? क्या कड़े कानूनी प्रावधान शो पीस बनकर रह गए हैं?

Sanjay Sharma

लखनऊ में एक बुजुर्ग अपने बेटे-बहू की रोज-रोज की प्रताडऩा से तंग आकर थाने पहुंचे और पुलिस अधिकारी से वृद्धाश्रम भेजने की मिन्नतें कीं। यह घटना बानगी भर है। हकीकत यह है कि देश में तमाम बुजुर्गों का हाल ऐसा ही है। कई बुजुर्ग आत्महत्या कर चुके हैं। कई एकाकी जीवन जीने को मजबूर है और कई वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। सवाल यह है कि बुजुर्गों का सम्मान करने वाले भारतीय समाज में इतना बड़ा बदलाव कैसे आया? क्या संयुक्त परिवार की समाप्ति के साथ बुजुर्ग समाज में उपेक्षित हो गए हैं? क्या भौतिकवाद और बढ़ते एकल परिवारों ने बुजुर्गों को हाशिए पर पहुंचा दिया है? क्या वृद्धजनों के बेहतर जीवन और सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की नहीं है? क्या कड़े कानूनी प्रावधान शो पीस बनकर रह गए हैं? क्या सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों में आई गिरावट ने बुजुर्गों को प्रताडऩा और उपेक्षा झेलने के लिए मजबूर कर दिया है?
भारतीय समाज में बुजुर्गों का सम्मान तेजी से घट रहा है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पांच में से एक बुजुर्ग अकेले या पत्नी के साथ रह रहा है। अधिकांश वृद्ध डिप्रेशन, आर्थराइटिस, डायबिटीज जैसे रोगों से ग्रस्त हैं। हेल्पेज इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब पांच करोड़ से अधिक बुजुर्ग आए दिन भूखे पेट सोते हैं। राज्य सरकारों की ओर से वृद्धों को दी जाने वाली पेंशन नाकाफी है। वे बेटे और बहू की प्रताडऩा का शिकार हो रहे हैं। शहरों में अकेले रहने वाले वृद्धों की सुरक्षा भगवान भरोसे हैं। तमाम बुजुर्ग अपनों की प्रताडऩा से तंग आकर वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। यह स्थिति एक दिन में नहीं आई। भौतिकवाद की अंधी दौड़ ने भारतीय समाज का ताना-बाना छिन्न-भिन्न कर दिया। लोग रोजी-रोटी की तलाश में शहरों में पहुंचे। शहरों के क्षेत्रफल व संसाधन बढ़ती जनसंख्या का बोझ संभालने में नाकाफी साबित हो रहे हैं। लिहाजा संयुक्त परिवार का स्थान एकाकी परिवार ने ले लिया। यहां पति-पत्नी और बच्चों के इर्द-गिर्द परिवार सिमट गया और बुजुर्ग परिवार के लिए बोझ बन गए। जिन परिवारों में बुजुर्ग हैं भी तो वे एकाकी जीवन जीने को अभिशप्त हैं। यह स्थिति चिंताजनक है। समाज और देश के विकास में इन बुजुर्गों ने भी अपना योगदान दिया है। यही नहीं ये बुजुर्ग अपने अनुभव से आज भी समाज को नई दिशा देने में समर्थ हैं। सरकार को चाहिए कि वह बुजुर्गों के बेहतर जीवन और सुरक्षा की व्यवस्था करे। साथ ही बुजुर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का कड़ाई से अनुपालन कराना सुनिश्चित करे। भारतीय समाज को भी अपने बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है। कोई भी समाज बुजुर्गों को उपेक्षित कर आगे नहीं बढ़ सकता है।

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