मिलावटखोरी पर अंकुश कब?

सवाल यह है कि कड़े कानूनों के बावजूद मिलावटखोरी पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन विभाग क्या कर रहा है? क्या कर्मचारियों की मिलीभगत से यह सारा खेल चल रहा है? क्या लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने की छूट किसी को दी जा सकती है? क्या सरकार मिलावटखोरी को लेकर गंभीर नहीं है?

Sanjay Sharma

प्रदेश में मिलावटखोरी का बाजार गर्म है। खाद्य पदार्थों समेत अन्य वस्तुओं में जमकर मिलावट की जा रही है। राजधानी लखनऊ में हाल ही में जांच के लिए भेजे गए गजक, मक्खन, आइसक्रीम, मिर्च पाउडर और कत्था के नमूने फेल हो गए हैं। सभी गुणवत्ता की कसौटी पर खरे नहीं उतरे। इसके पहले यहां सरसों के तेल और मसालों में मिलावट पाई गई थी। मिलावटी खाद्य पदार्थ लोगों की सेहत पर खराब असर डाल रहे हैं। सवाल यह है कि कड़े कानूनों के बावजूद मिलावटखोरी पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन विभाग क्या कर रहा है? क्या कर्मचारियों की मिलीभगत से यह सारा खेल चल रहा है? क्या लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने की छूट किसी को दी जा सकती है? क्या सरकार मिलावटखोरी को लेकर गंभीर नहीं है? क्या भ्रष्टïाचार के कारण स्थितियां बिगड़ती जा रही हैं?
राजधानी लखनऊ ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में मिलावटखोरी का धंधा फल-फूल रहा है। मोटा मुनाफा कमाने के चक्कर में मिलावटखोर लोगों की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं। अधिकांश मिलावटखोर शहर के करीब बसे ग्रामीण क्षेत्रों में अपने पैर पसारते हैं। यहां ये दुकानदारों से मिलकर मिलावटी खाद्य पदार्थों को ग्राहकों को बेचते हैं और इसके एवज में दुकानदारों को खासा मुनाफा देते हैं। यह स्थिति तब है जब मिलावरखोरी पर नियंत्रण लगाने के लिए हर जिले में खाद्य एवं औषधि नियंत्रण विभाग है। विभाग के पास भारी-भरकम अमला है और सरकार इन पर भारी धनराशि सालाना खर्च करती है। बावजूद इसके मिलावटखोरी पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। कई बार छापेमारी के दौरान संबंधित मिलावटखोरों को कार्रवाई की पूर्व सूचना तक मिल जाती है। दूसरी ओर विभाग की ओर से छापेमारी के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है। यही वजह है कि मिलावटखोरों के हौसले बुलंद हैं। जब राजधानी में मिलावटखोरी का धंधा चरम पर है तो अन्य जिलों के बारे में आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। वहीं चिकित्सकों का कहना है कि मिलावटी खाद्य पदार्थ के सेवन से स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है। मिलावटी दूध, मक्खन जहां पाचन तंत्र को खराब कर देते हैं वहीं मिलावटी सरसों के तेल से ड्राप्सी जैसी घातक बीमारी हो सकती है। यदि सरकार मिलावटखोरी पर नियंत्रण लगाना चाहती है तो उसे न केवल संबंधित विभाग की जिम्मेदारी तय करनी होगी बल्कि लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी करनी होगी। दूसरी ओर मिलावटखोरों के खिलाफ सतत अभियान चलाया जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो स्थितियां विस्फोटक हो जाएंगी।

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