अव्यवस्थाओं से जूझते शहर और लचर तंत्र

सवाल यह है कि हर साल अरबों रुपये खर्च करने के बाद भी शहरों में व्याप्त अव्यवस्थाओं का अंत क्यों नहीं हो रहा है? शुद्ध पेय जल की व्यवस्था, जाम से निजात, जलभराव से मुक्ति, सही सडक़ें और गुणवत्ता युक्त स्वास्थ्य सेवाएं इन शहरों में सपना क्यों होती जा रही हैं? क्या अनियोजित विकास ने समस्याओं में इजाफा कर दिया है? आखिर शहरवासी प्रदूषण झेलने के लिए अभिशप्त क्यों हैं?

Sanjay Sharma

राजधानी लखनऊ समेत प्रदेश के तमाम शहर अव्यवस्थाओं से जूझ रहे हैं। कई सरकारें आईं और गईं लेकिन शहरों की सूरत में कोई बदलाव नहीं आया। दावे और वादे करने के बाद भी स्थितियां जस की तस हैं। लिहाजा इन अव्यवस्थाओं से शहरों में रहने वाले लोग रोज दो चार हो रहे हैं। सवाल यह है कि हर साल अरबों रुपये खर्च करने के बाद भी शहरों में व्याप्त अव्यवस्थाओं का अंत क्यों नहीं हो रहा है? शुद्ध पेय जल की व्यवस्था, जाम से निजात, जलभराव से मुक्ति, सही सडक़ें और गुणवत्ता युक्त स्वास्थ्य सेवाएं इन शहरों में सपना क्यों बनती जा रही हैं? क्या अनियोजित विकास ने समस्याओं में इजाफा कर दिया है? आखिर शहरवासी प्रदूषण झेलने के लिए अभिशप्त क्यों हैं? क्या लचर तंत्र और भ्रष्टïाचार ने शहरों को बीमार कर दिया है? क्या सरकार को इस पर विचार करने और इसके समाधान की फिक्र नहीं है? क्या ऐसे ही शहरों को स्मार्ट बनाया जा सकेगा? क्या मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव ने शहरों में अव्यवस्थाओं को बढ़ा दिया है?
पूरे विश्व में औद्योगिककरण के साथ ही शहरीकरण का भी दौर शुरू हुआ। स्वतंत्रता के बाद भारत में भी तेजी से शहरों का विकास हुआ। यह दीगर है कि सरकार की ओर से शहरों को स्थापित करने के लिए कोई ठोस योजना नहीं तैयार की गई। लिहाजा अधिकांश पुराने शहर आधुनिक होते गए। ये बेतरतीब फैलते गए। इन शहरों में कल-कारखाने लगाए गए। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का इंतजाम किया गया। राजधानी बने शहरों में सरकारी दफ्तर बनाए गए। ऐसे में ये शहर रोजगार के नए केंद्र बने। लोग रोजी-रोटी की तलाश में गांव से शहरों की ओर पलायन करने लगे। जनसंख्या का घनत्व तेजी से बढ़ा। यह घनत्व शहर के संसाधनों की तुलना में बहुत अधिक हो गया और स्थितियां बिगड़ती चली गई। बिल्डरों ने मुनाफे के चक्कर में कॉलोनियां बनानी शुरू कर दीं। शहरों की व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकार ने नगर निगमों और नगरपालिकाओं को सौंप दी। ये राजनीति और भ्रष्टïाचार का अड्डा बन गईं। शहरवासियों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना इनकी प्राथमिकता में काफी पीछे छूट गया। लिहाजा स्वच्छ पेयजल, सफाई आदि एक जटिल समस्या बन गई। सडक़ों की हालत बेहद जर्जर है। जलभराव और जाम कभी न खत्म होने वाली समस्या बन चुकी है। यहां की हवा जहरीली होती जा रही है। यदि सरकार शहरों को दुरुस्त करना चाहती है तो वह इसकी जिम्मेदारी संभाल रहे विभागों पर नकेल कसे साथ ही गांव के विकास पर फोकस करे। गांवों का समुचित विकास किए बिना शहरों की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा।

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