मॉब लिंचिंग पर लगाम कब?

सवाल यह है कि भीड़ हिंसा पर क्यों उतारू हो गई है? क्या भीड़ को कानून को हाथ में लेने की छूट दी जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सरकारों ने मॉब लिंचिंग को रोकने के लिए ठोस पहल क्यों नहीं की? क्या राज्यों की पुलिस ऐसे अपराधों पर नियंत्रण लगाने में नाकाम हैं? क्या भीड़ की हिंसा समाज के सामाजिक ताने-बाने पर नकारात्मक असर नहीं डालेगी?

Sanjay Sharma

झारखंड में चोरी के आरोप में एक युवक को पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। बाद में भीड़ ने उसे पुलिस को सौंप दिया। पुलिस ने युवक को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जहां पांच दिन बाद उसकी मौत हो गई। मॉब लिंचिंग की यह कोई पहली घटना नहीं है। इसी तरह की कई घटनाएं उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्टï्र समेत देश के कई राज्यों में हो चुकी हैं और इनका सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है। सवाल यह है कि भीड़ हिंसा पर क्यों उतारू हो गई है? क्या भीड़ को कानून को हाथ में लेने की छूट दी जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सरकारों ने मॉब लिंचिंग को रोकने के लिए ठोस पहल क्यों नहीं की? क्या राज्यों की पुलिस ऐसे अपराधों पर नियंत्रण लगाने में नाकाम हैं? क्या भीड़ की हिंसा समाज के सामाजिक ताने-बाने पर नकारात्मक असर नहीं डालेगी? क्या सियासी दलों को इस मामले में गंभीरता से सोचने की जरूरत नहीं है? क्या मॉब लिंचिंग के नाम पर लोगों की हो रही हत्याएं लोकतंत्र के लिए घातक नहीं है?
पिछले कुछ वर्षों से मॉब लिंचिंग की घटनाएं पूरे देश में अचानक बढ़ गई है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसी घटनाओं पर चिंता जाहिर कर चुके हैं। पुलिस व स्थानीय खुफिया तंत्र के बावजूद राज्यों में मॉब लिंचिंग पर लगाम नहीं लग पा रही है। हालत यह है कि लोग अनजाने गांवों में जाने से डरने लगे हैं। सोशल मीडिया के जरिए भी तरह-तरह की अफवाहें फैलाई जाती हैं। अफवाहों के कारण लोग उत्तेजित हो जाते हैं और बिना जाने समझे निर्दोषों को पीट-पीटकर मार डालते हैं। गौरक्षा के नाम कई निर्दोषों को मार डालने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट भी मॉब लिंचिंग को लेकर नाराजगी जता चुका है। पिछले वर्ष तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने राज्य सरकारों को मॉब लिंचिंग को रोकने के लिए जिलावार रैपिड रिस्पांस टीम के गठन और विशेष हेल्पलाइन शुरू करने के आदेश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी को भी कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती। बावजूद इसके राज्य सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को जमीन पर उतारने की कोई ठोस पहल नहीं की। हां, कुछ राज्य सरकारों ने नोडल अधिकारियों की नियुक्ति कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री जरूर कर ली। यदि सरकार मॉब लिंचिंग पर लगाम लगाना चाहती है तो उसे पुलिस तंत्र को सक्रिय करने के अलावा विशेष टीमों का गठन करना होगा जो तत्काल मौके पर पहुंचकर स्थितियों को नियंत्रित कर सके। अन्यथा यह देश के सामाजिक ताने-बाने और सांप्रदायिक सौहार्द के अलावा लोकतंत्र के लिए भी घातक साबित होगा।

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