गोमती की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन?

सवाल यह है कि जीवनदायिनी गोमती की इस दुर्दशा का जिम्मेदार कौन है? करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने के बाद भी नदी की सेहत में सुधार क्यों नहीं हो रहा है? नदी में प्रदूषण का स्तर क्यों बढ़ रहा है? क्या विकास की अंधी दौड़ ने नदी को बीमार कर दिया है? क्या भ्रष्टïाचार ने गोमती को भी अपनी चपेट में ले लिया है? क्या सरकार को लोगों की सेहत की चिंता नहीं है?

Sanjay Sharma

गोमती नदी को लेकर आई एनजीटी की हालिया रिपोर्ट बेहद चिंताजनक है। नदी की हालत को देखते हुए एनजीटी की कूड़ा प्रबंधन एवं अनुश्रवण समिति ने लोगों को गोमती में नहाने और उसके किनारे टहलने से परहेज करने की हिदायत दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसा करना सेहत के लिए हानिकारक साबित होगा। सवाल यह है कि जीवनदायिनी गोमती की इस दुर्दशा का जिम्मेदार कौन है? करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने के बाद भी नदी की सेहत में सुधार क्यों नहीं हो रहा है? नदी में प्रदूषण का स्तर क्यों बढ़ रहा है? क्या विकास की अंधी दौड़ ने नदी को बीमार कर दिया है? क्या भ्रष्टïाचार ने गोमती को भी अपनी चपेट में ले लिया है? क्या सरकार को लोगों की सेहत की चिंता नहीं है? क्या नदी की सेहत को दुरुस्त करने के लिए ठोस उपाय करने की जरूरत नहीं है?
गोमती नदी पीलीभीत के माधव टांडा कस्बा स्थित गोमद ताल से निकलती है। यह प्रदेश के 11 जिलों से होती हुई करीब 900 किमी की यात्रा तय करते हुए सैदपुर पहुंचती है और वहां गंगा में विलीन हो जाती है। गोमती की यह दुर्दशा एक दिन में नहीं हुई है। वर्षों से इसमें कल-कारखानों के केमिकल और शहरों के सीवर बहाए जा रहे हैं। रही सही कसर प्लॉस्टिक की थैलियों में कूड़ा भरकर फेंकने वालों ने निकाल दी है। अकेले लखनऊ में एक लाख दो हजार 26 लीटर सीवर का गंदा पानी गोमती में गिराया जा रहा है। यहां करीब 33 नाले गोमती में गिर रहे हैं। एसटीपी प्लांट की कमी के कारण हालत बिगड़ती जा रही है और नदी एक गंदे नाले में तब्दील हो चुकी है। यही हाल पीलीभीत, शाहजहांपुर, लखीमपुर खीरी, हरदोई, सीतापुर बाराबंकी, फैजाबाद, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ तथा जौनपुर में गोमती का है। यह स्थिति तब है जब पिछले 70 सालों से सरकारें गोमती को लेकर गंभीर होने के दावे करती रही हैं। गोमती को प्रदूषण मुक्त करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए लेकिन नतीजा सिफर रहा। गोमती स्वच्छ होने की जगह और भी मैली होती चली गई। इसके पानी में कई स्थानों पर आक्सीजन की मात्रा शून्य हो चुकी है। यह स्थिति गोमती के जल जीवन को नष्टï कर देगी। अगर सरकार गोमती को स्वच्छ और निर्मल बनाना चाहती है तो उसे अधिक से अधिक एसटीपी प्लांट लगाने होंगे और उपचारित किए गए सीवर पानी को गोमती में भेजना सुनिश्चित करना होगा। नदी में प्लास्टिक, ठोस व जैव चिकित्सीय अपशिष्ट न गिरे, इसकी व्यवस्था भी करनी होगी। नदी किनारे वृक्ष लगाने होंगे ताकि वायु प्रदूषण को खत्म किया जा सके। वहीं एनजीटी के दिशा-निर्देशों के मुताबिक काम करना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो गोमती का अस्तित्व खत्म हो जाएगा।

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