पिघलते ग्लेशियर विनाश की आहट

सवाल यह है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के खतरे क्या हैं? क्या इसका नकारात्मक असर भारत समेत कई पड़ोसी देशों पर पड़ेगा? क्या भविष्य में नदियां सूख जाएंगी और लोग पानी के लिए तरस जाएंगे? क्या पिघलते ग्लेशियर पहाड़ी इलाकों में भारी विनाश का कारण बन सकते हैं? क्या दुनिया के तमाम देश इस भयानक खतरे से निपटने को तैयार हैं?

Sanjay Sharma

हिमालय के छह सौ से अधिक ग्लेशियरों पर खतरा मंडरा रहा है। साइंस एडवांसेज जर्नल की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु परिवर्तन से तापमान तेजी से बढ़ रहा है। इसके कारण हिमालय के ग्लेशियर दोगुनी रफ्तार से पिघल रहे हैं। यदि यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में इनके पिघलने की रफ्तार और तेज हो जाएगी और एक दिन इनका अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। सवाल यह है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के खतरे क्या हैं? क्या इसका नकारात्मक असर भारत समेत कई पड़ोसी देशों पर पड़ेगा? क्या भविष्य में नदियां सूख जाएंगी और लोग पानी के लिए तरस जाएंगे? क्या पिघलते ग्लेशियर पहाड़ी इलाकों में भारी विनाश का कारण बन सकते हैं? क्या दुनिया के तमाम देश इस भयानक खतरे से निपटने को तैयार हैं? क्या जलवायु परिवर्तन को संतुलित करने के लिए प्रभावी उपायों को करने की जरूरत भारत समेत विश्व के देशों को नहीं है?
पिछले पांच दशकों में हिमालय क्षेत्र के तापमान में करीब एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। इसका असर ग्लेशियरों पर पड़ा है और उनके पिघलने की दर बढ़ गई है। कुछ ग्लेशियर पांच मीटर सालाना की तेजी से पिघल रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2000 तक ग्लेशियरों की पिघलने की दर सालाना 10 इंच थी जो अब 20 इंच तक पहुंच चुकी है। इससे करीब आठ अरब टन पानी का नुकसान हो रहा है। ऐसा ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हो रहा है। यदि यही हाल रहा तो इन ग्लेशियरों से आने वाला पानी बाढ़ जैसी विभिषिका को जन्म देगा। पहाड़ी इलाकों में झीलों का निर्माण होगा। ये झीलें भारत में केदारनाथ जैसी आपदा उत्पन्न कर सकती हैं। उत्तराखंड स्थित केदारनाथ में ऐसी ही एक झील के फटने से कई हजार लोग मारे गए थे। हालिया रिपोर्ट के मुताबिक केदारनाथ के पास ऐसी एक और झील बन रही है। इसके अलावा ग्लेशियर नदियों को पानी उपलब्ध कराते हैं। इस पानी से बिजली का उत्पादन और फसलों की सिंचाई की जाती है। इसका इस्तेमाल पीने के लिए भी किया जाता है। भारत, चीन, नेपाल और भूटान के करोड़ों लोग नदियों पर निर्भर हैं। अगर ग्लेशियर खत्म हो गए तो नदियां भी सूख जाएंगी और इससे न केवल पेयजल बल्कि खाद्यान्न का भी संकट उत्पन्न हो जाएगा। बिजली से चलने वाले कल-कारखाने बंद हो जाएंगे। यूनाइटेड नेशन की साइंटिस्ट कमेटी भी चेतावनी दे चुकी है कि अगर ग्रीनहाउस गैसों का प्रदूषण कम नहीं किया गया तो दुनिया सूखे, बाढ़ और भयानक गर्मी की चपेट में आ जाएगी। ऐसे में भारत को चाहिए कि वह इस मामले में विश्व के देशों के साथ मिलकर पर्यावरण संरक्षण के लिए मुहिम चलाए। यदि समय रहते दुनिया नहीं चेती तो विनाश तय है।

 

Loading...
Pin It

Comments are closed.