जान लेते आवारा पशुओं पर नकेल कब?

सवाल यह है कि आखिर शहर में आवारा पशुओं की संख्या लगातार बढ़ क्यों रही है? लोगों के लिए जानलेवा बन चुके इन पशुओं पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है? इन पशुओं को सडक़ों से हटाने के लिए जारी सरकार के आदेशों का सही तरीके से पालन क्यों नहीं हो रहा है? पशुओं की धर-पकड़ अभियान के बावजूद स्थितियां
सुधर क्यों नहीं रही हैं?

Sanja Sharma

प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आवारा पशुओं का कहर जारी है। पिछले दिनों तालकटोरा और इटौंजा में सांड़ों ने दो लोगों की जान ले ली जबकि दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके पहले भी कई लोगों की मौत सांड़ों के हमले से हो चुकी है। वहीं सडक़ों पर घूम रहे तमाम आवारा पशु हादसों का कारण बन रहे हैं। इन घटनाओं के बावजूद इसके नियंत्रण के लिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है। पशुओं की धर-पकड़ के लिए जिम्मेदार विभाग के अधिकारी भी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। सवाल यह है कि आखिर शहर में आवारा पशुओं की संख्या लगातार बढ़ क्यों रही है? लोगों के लिए जानलेवा बन चुके इन पशुओं पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है? इन पशुओं को सडक़ों से हटाने के लिए जारी सरकार के आदेशों का सही तरीके से पालन क्यों नहीं हो रहा है? पशुओं की धर-पकड़ अभियान के बावजूद स्थितियां सुधर क्यों नहीं रही हैं? क्या लोगों की जान के दुश्मन बने आवारा पशुओं को लेकर सरकार गंभीर नहीं है? क्या इन पशुओं के लिए बनाई गई तमाम योजनाएं लापरवाही का शिकार हो गई हैं?
राजधानी समेत पूरे प्रदेश में आवारा पशुओं का आतंक है। ये पशु न केवल किसानों की फसलों को बर्बाद कर रहे हैं बल्कि लोगों पर जानलेवा हमले भी कर रहे हैं। फसलों को जानवरों से बचाने के लिए किसानों को रात-रात भर जागना पड़ता है। बावजूद स्थितियां बदतर होती जा रही हैं। सरकार ने इन पशुओं के लिए आश्रय स्थल बनाने का आदेश जारी किया था। साथ ही उनके चारे आदि की व्यवस्था करने के भी निर्देश दिए थे। इसके बाद भी पशुओं की संख्या के हिसाब से आश्रयशालाओं का अभी तक निर्माण नहीं किया जा सका है। शहरों में ये पशु सडक़ दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं। ये लोगों पर हमला भी कर रहे हैं। लखनऊ में सांड़ों के हमले में कई लोग मारे जा चुके हैं। आवारा पशुओं के धर-पकड़ की जिम्मेदारी नगर निगम के पास है लेकिन इस पर मुस्तैदी से काम नहीं किया जा रहा है। पशुओं को पकडऩे के अभियान के नाम पर खानापूूर्ति की जा रही है। यहां आवारा पशुओं की संख्या बढऩे के पीछे शहर में संचालित अवैध डेयरियां हैं। ये पशुओं को खुले में छोड़ देते हैं। लिहाजा ये पशु सडक़ों पर चले आते हैं और हादसों का कारण बनते हैं। यदि सरकार आवारा पशुओं पर नियंत्रण लगाना चाहती है तो उसे न केवल इनको सडक़ों पर से हटाना होगा बल्कि उनके रहने के लिए जल्द से जल्द पर्याप्त संख्या में आश्रयस्थल बनवाने होंगे। साथ ही शहर में अवैध रूप से चल रही डेयरियों के संचालकों पर भी शिकंजा कसना होगा।

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