प्रतिबंधित पॉलीथिन प्रदूषण और सरकार

सवाल यह है कि प्रतिबंध के बावजूद पॉलीथिन का प्रयोग क्यों हो रहा है? जुर्माने और दंड के प्रावधान बेअसर क्यों हो गए हैं? आखिर इसको नियंत्रित करने वाले विभाग क्या कर रहे हैं? पॉलीथिन उत्पादों का उत्पादन करने वाले बड़़े कारखानों के खिलाफ ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है? सरकार के आदेशों को नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है?

SAnjay Sharma

उत्तर प्रदेश में पिछले वर्ष जुलाई में सरकार ने 50 माइक्रॉन से कम की पॉलीथिन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। बावजूद आज तक यह आदेश जमीन पर नहीं उतर सका। राजधानी लखनऊ से लेकर प्रदेश के तमाम शहरों में इसका धड़ल्ले से प्रयोग किया जा रहा है। सवाल यह है कि प्रतिबंध के बावजूद पॉलीथिन का प्रयोग क्यों हो रहा है? जुर्माने और दंड के प्रावधान बेअसर क्यों हो गए हैं? आखिर इसको नियंत्रित करने वाले विभाग क्या कर रहे हैं? पॉलीथिन उत्पादों का उत्पादन करने वाले बड़़े कारखानों के खिलाफ ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है? सरकार के आदेशों को नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है? नगर निगम और पालिकाएं अभियान के नाम पर खानापूर्ति क्यों कर रही हैं? क्या लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने की छूट किसी को दी जा सकती है?
प्रदेश सरकार ने पर्यावरण संरक्षण और लोगों की सेहत को ध्यान में रखते हुए पॉलीथिन कैरीबैग, कप और ग्लास के उत्पादन व बिक्री को प्रतिबंधित कर दिया था। उल्लंघन करने वालों के खिलाफ जुर्माने और सजा का प्रावधान किया गया है। बावजूद स्थितियों में कोई सुधार नहीं हुआ। नगर निगमों और पालिकाओं ने आदेश को लागू करने के लिए कुछ दिन तो प्रतिबंधित पॉलीथिन के खिलाफ अभियान चलाए लेकिन बाद में इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। लिहाजा दुकानों में इनका जमकर इस्तेमाल किया जा रहा है। उत्पादन जारी है। पूरे प्रदेश में पतली पॉलीथिन का कारोबार करीब 100 करोड़ का है, इससे पैकिंग और खाने पीने का सामान बनाने का पैकेट बनाया जाता है। यह आदमी और पशु दोनों की सेहत के लिए खतरनाक है। यह पर्यावरण को भी प्रदूषित कर रही है। पॉलीथिन मिट्टी में मिलती नहीं हैं। इसके कारण खेतों की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। शहरों में इसके कारण नाली-नाले चोक हो जाते हैं। सफाईकर्मी अक्सर कूड़े को जला देते हैं। कूड़े में पड़ी पॉलीथिन जलने पर वातावरण प्रदूषित होता है। हकीकत यह है कि प्रतिबंधित पॉलीथिन को रोकने के लिए नगर निगम और पालिकाएं अभियान के दौरान केवल दुकानदारों पर शिकंजा कसती हैं। इसका उत्पादन कर रहे कारखानों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती है। इसके कारण स्थितियों में सुधार नहीं आ रहा है। यदि सरकार प्रदेश को पॉलीथिन से मुक्त करना चाहती है तो उसे उन कारखानों पर कार्रवाई करनी होगी जहां इसका उत्पादन होता है। उत्पादन बंद हो जाने के बाद इसका प्रयोग खुद ही बंद हो जाएगा। इसके अलावा सरकार को पॉलीथिन के प्रयोग के घातक परिणामों को लेकर सतत जागरूकता अभियान चलाना होगा ताकि लोग इसके दुष्प्रभावों को जान सकें।

 

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