जहरीली शराब से मरते लोग, सरकार और सवाल

सवाल यह है कि सरकारी दुकान में जहरीली शराब कैसे पहुंची? क्या ठेकेदार की मिलीभगत से यह धंधा चल रहा था? आबकारी और पुलिस विभाग क्या कर रहे थे? इन मौतों का जिम्मेदार कौन है? पूरे प्रदेश में अवैध शराब की भट्ठियों पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है? क्या पूरा तंत्र ही शराब माफियाओं के सामने घुटने टेक चुका है?

Sanjay Sharma

बाराबंकी के रामनगर थाना क्षेत्र के आसपास के गांव के 16 लोगों की जान जहरीली शराब ने ले ली। कई की हालत नाजुक है। प्रदेश सरकार ने जिला आबकारी अधिकारी समेत एक दर्जन लोगों को सस्पेंड कर दिया है। मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख की आर्थिक मदद का ऐलान किया गया है। एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है और जांच के लिए टीम गठित कर दी गई है। सवाल यह है कि सरकारी दुकान में जहरीली शराब कैसे पहुंची? क्या ठेकेदार की मिलीभगत से यह धंधा चल रहा था? आबकारी और पुलिस विभाग क्या कर रहे थे? इन मौतों का जिम्मेदार कौन है? पूरे प्रदेश में अवैध शराब की भट्ठियों पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है? क्या पूरा तंत्र ही शराब माफियाओं के सामने घुटने टेक चुका है? घटना के बाद सक्रिय होने वाली पुलिस और आबकारी टीम पहले मुस्तैदी क्यों नहीं दिखाती है?
यूपी में जहरीली शराब का कारोबार बढ़ता जा रहा है। लिहाजा हर साल जहरीली शराब पीने से काफी संख्या में लोगों की मौत हो रही है। फरवरी में जहरीली शराब से सहारनपुर के 64 और कुशीनगर में 8 लोगों की मौत हो गई थी। उन्नाव और कानपुर में भी कई लोग काल के गाल में समा गए थे। पिछले साल बाराबंकी के देवा और रामनगर में 11 लोगों की मौत हुई थी। लखनऊ के मलिहाबाद में जहरीली शराब से 50 लोग मर गए थे। ये आंकड़े भयावह हैं। हैरानी यह है कि जिस शराब को पीकर बाराबंकी में लोगों की मौतें हुई हैं, वह सरकारी दुकान थी। ग्रामीणों की माने तो ठेकेदार नकली शराब बेच रहा था। हालांकि गड़बड़ी कैसे हुई, इसका पता जांच के बाद ही लगेगा। बाराबंकी में दरियाबाद, रामसनेहीघाट, सूरतगंज, सतरिख, अहमदपुर जैसे क्षेत्रों में कच्ची शराब की भट्ठियां धधक रही हैं। इसको पाउच में भरकर ग्रामीण क्षेत्रों में सप्लाई किया जाता है। इस बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि आबकारी और पुलिस विभाग को इसकी भनक नहीं है। कच्ची शराब बनाने में इथेनॉल, मिथाइल एल्कोहल, ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन और यूरिया जैसे खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। यह जानलेवा साबित होते हैं। यही हाल प्रदेश के अधिकांश जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों के हैं। आबकारी और पुलिस टीम तभी सक्रिय होती है जब बड़ी घटना घट जाती है। मामले के ठंडा पड़ते ही वह फिर पुराने ढर्रे पर लौट आती है। सरकार यदि इस पर नियंत्रण लगाना चाहती है तो उसे न केवल आबकारी नीति के मानकों को सख्ती से लागू करना सुनिश्चित करना होगा बल्कि देशी शराब के ठेकों की नियमित जांच भी करानी होगी। साथ ही अवैध शराब के कारोबार को पूरी तरह बंद कराना होगा।

 

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