अग्निकांडों से सबक कब लेगी सरकार?

सवाल यह है कि अग्निकांडों में हो रहे जान-माल के नुकसान का जिम्मेदार कौन है? क्या सार्वजनिक इमारतों में आग से बचाव के उपायों पर गौर करने की जरूरत नहीं है? बिना फायर एनओसी के इन इमारतों में संस्थान या विभाग कैसे संचालित किए जा रहे हैं? क्या यह सारा खेल मिलीभगत से चल रहा है? क्या फायर विभाग इसके लिए जिम्मेदार नहीं है?

Sanjay Sharma

गुजरात के सूरत में एक कोचिंग संस्थान में आग लगने से कई छात्रों की मौत हो गई जबकि कई झुलस गए। यूपी के कानपुर में एक बोरे के गोदाम में आग लग गई और एक परिवार बाल-बाल बच गया। ये घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं कि आग से बचाव के उपायों को लेकर कितनी लापरवाही बरती जा रही है व सरकारी तंत्र भी इस मामले में कतई गंभीर नहीं दिख रहा है। इसके पूर्व लखनऊ में भी आग लगने की कई बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं। सवाल यह है कि अग्निकांडों में हो रहे जान-माल के नुकसान का जिम्मेदार कौन है? क्या सार्वजनिक इमारतों में आग से बचाव के उपायों पर गौर करने की जरूरत नहीं है? बिना फायर एनओसी के इन इमारतों में संस्थान या विभाग कैसे संचालित किए जा रहे हैं? क्या यह सारा खेल मिलीभगत से चल रहा है? क्या फायर विभाग इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? क्या लखनऊ समेत प्रदेश के तमाम शहर आग के मुहाने पर खड़े हैं और सरकारी तंत्र आंख मूंदे है? क्या सरकार और संस्थान चलाने वाले हादसों से सबक लेने को तैयार नहीं है?
पूरे देश में अग्नि सुरक्षा उपायों को लेकर घोर लापरवाही दिखाई दे रही है। यूपी के तमाम शहरों की भी हालत कोई बहुत अच्छी नहीं है। लखनऊ में कई अग्निकांडों के बाद भी स्थितियों में आज तक कोई सुधार नहीं हुआ है। यहां आवासीय क्षेत्रों में बिना फायर एनओसी के उद्योग धंधे चलाए जा रहे हैं। संकरी गलियों में तमाम कोचिंग संस्थान खुले हुए हैं। एक-एक इमारतों में दर्जनों कोचिंग सेंटर संचालित किए जा रहे हैं। संकरी गलियों में दमकल गाडिय़ां नहीं पहुंच सकती हैं। अधिकांश में फायर उपकरण नहीं हैं। सरकारी अस्पताल और विभाग भी इस लापरवाही से अछूते नहीं है। अधिकांश अस्पतालों में फायर उपकरण केवल शो पीस बनकर रह गए हैं। कई एक्सपायरी हो चुके हैं। पहले फायर उपकरणों को दिखाकर एनओसी ले लिया गया लेकिन बाद में इनको बदला तक नहीं गया। आग लगने के दौरान आपातकालीन निकासी की कोई व्यवस्था नहीं की गई। फायर विभाग भी एनओसी देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है। अग्नि सुरक्षा मानकों की जांच के लिए शायद ही कभी इन इमारतों का निरीक्षण किया जाता है। प्रशासनिक अमला भी तभी जागता है जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है। जब राजधानी का यह हाल है तो अन्य शहरों की स्थितियों का अंदाजा लगाया जा सकता है। सरकार को चाहिए कि वह आग से बचाव के लिए संबंधित विभागों को न केवल जवाबदेह बनाए बल्कि अग्नि सुरक्षा नीति का सख्ती से पालन कराना सुनिश्चित करे। यदि ऐसा नहीं किया गया तो राजधानी में भी सूरत जैसे हादसे कभी भी हो सकते हैं।

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