स्वास्थ्य सेवाएं, सरकार और आम आदमी

सवाल यह है कि हर साल करोड़ों के बजट के बावजूद स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है? विशेषज्ञ चिकित्सकों के रिक्त पदों पर नियुक्ति करने में सरकार नाकाम क्यों हो रही है? सरकारी अस्पतालों में दवाओं की किल्लत क्यों हो रही है? ऑपरेशन से लेकर जांच तक के लिए मरीजों को तारीख पर तारीख क्यों दी जा रही है? क्या पूरा तंत्र भ्रष्टïाचार का शिकार हो चुका है?

Sanjay Sharma

सरकार के तमाम दावों के बावजूद प्रदेश की राजधानी लखनऊ समेत तमाम जिलों की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं पटरी पर आती नहीं दिख रही है। अधिकांश अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों, जांच उपकरणों और दवाओं की कमी है। इसके चलते आयुष्मान समेत कई योजनाओं का लाभ जनता को नहीं मिल पा रहा है। सवाल यह है कि हर साल करोड़ों के बजट के बावजूद स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है? विशेषज्ञ चिकित्सकों के रिक्त पदों पर नियुक्ति करने में सरकार नाकाम क्यों हो रही है? सरकारी अस्पतालों में दवाओं की किल्लत क्यों हो रही है? ऑपरेशन से लेकर जांच तक के लिए मरीजों को तारीख पर तारीख क्यों दी जा रही है? क्या पूरा तंत्र भ्रष्टïाचार का शिकार हो चुका है? क्या स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के लिए सरकार गंभीर नहीं है? क्या ऐसे ही आम आदमी को गुणवत्ता युक्त स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने का दावा साकार किया जा सकता है?
प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं सुधरने का नाम नहीं ले रही हैं। राजधानी लखनऊ के सरकारी अस्पतालों की हालत भी कोई बहुत अच्छी नहीं है। यहां के नामचीन अस्पतालों में भी विशेषज्ञ चिकित्सकों, दवाओं और आधुनिक जांच उपकरणों की बेहद कमी है। मरीजों को जांच और इलाज के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। इसका खामियाजा गंभीर रोगियों को भुगतना पड़ता है। अधिकांश कर्मचारी समय से ड्यूटी पर नहीं पहुंचते हैं। इसके कारण काउंटर पर पर्चा बनवाने के लिए लंबी-लंबी कतारें लगी रहती हैं। जरूरी टेस्ट के लिए पंद्रह दिन से महीने भर का समय दिया जा रहा है। अस्पतालों में मरीज को आधी-अधूरी दवाएं देकर चलता कर दिया जाता है। विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी के चलते ऑपरेशन की वेटिंग लगातार बढ़ती जा रही है। प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की हालत और भी खराब है। अधिकांश सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर समय से चिकित्सक उपलब्ध नहीं होते हैं। रही सही कसर प्राइवेट प्रैक्टिस में लिप्त चिकित्सक पूरी कर देते हैं। उपकरणों और दवाओं की खरीद में कमीशनखोरी का खेल चल रहा है। पिछले दिनों यहां के एक अस्पताल में दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठ चुका है। जब राजधानी में यह हाल है तो दूसरे जिलों के बारे में आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। अगर सरकार आम आदमी को गुणवत्ता युक्त चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराना चाहती है तो उसे न केवल उपकरणों और दवाओं की समुचित व्यवस्था करनी होगी बल्कि विशेषज्ञ चिकित्सकों की जल्द से जल्द तैनाती करनी होगी। इसके अलावा अस्पतालों में व्याप्त भ्रष्टïाचार पर भी लगाम लगाना होगा।

 

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