करोड़ों बह गए पर नहीं सुधरी गोमा की सेहत

  • आज भी नदी में गिर रहे दर्जनों नाले, बढ़ता जा रहा प्रदूषण
  • कुकरैल नाले पर लगा जियो ट्यूब भी बन गया शो-पीस

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। लखनऊ में गोमती नदी को निर्मल और प्रदूषण मुक्त करने के नाम पर करोड़ों रुपये बहा दिए गए लेकिन नदी की सेहत नहीं सुधरी। शहर के दर्जनों नाले सीधे गोमती यानी गोमा में गिर रहे हैं। इसके अलावा एसटीपी के संचालन में लापरवाही के चलते शहर का गंदा पानी भी नदी में गिर रहा है। वहीं कुकरैल नाले पर जिस जियो टयूब का उद्घाटन सीएम योगी ने किया था, वह भी शो-पीस बन कर रह गया है।
पिछले साल गोमती किनारे कुकरैल नाले का पानी साफ करने के लिए जियो टेक्स्टाइल डी-वॉटरिंग ट्यूब लगाया गया था लेकिन कुछ ही दिन बाद इसे बंद कर दिया गया। लिहाजा कुकरैल नाले का गंदा पानी दोबारा गोमती में गिरने लगा है। नाले का पानी साफ करने के लिए ट्यूब चालू नहीं की गई है जबकि गत वर्ष 10 अक्टूबर को सीएम योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने जियो ट्यूब का उद्घाटन किया था। इसे गोमती में सीधे गिर रहे नालों का पानी साफ करने के लिए बतौर पायलट प्रोजेक्ट पेश किया गया था। उद्घाटन के चार माह बाद एक बार फिर कुकरैल नाले का गंदा पानी गोमती में गिरने लगा है। गोमती में नाले से करीब 50 एमएलडी गंदा पानी गिर रहा है जबकि ट्यूब की क्षमता केवल तीन एमएलडी है। दूसरी ओर नदी में लगातार प्रदूषण बढ़ रहा है। हालत यह है कि 2009 के बाद से ही इसके पानी में हैवी मेटल्स मिलने के लक्षण दिखने शुरू हो गए थे। इसकी एक वजह यह है कि गोमती के तेज बहाव नहीं है। इसके अलावा उद्योगों के ऐसे वेस्ट जिनमें हैवी मेटल्स थे, वह नदी में सीधे जा रहे थे। कम पानी की वजह से हैवी मेटल्स का नदी में कंसन्ट्रेशन बढ़ता गया। बाइक या कार के छोटे सर्विस स्टेशनों से निकली गंदगी भी नालों के जरिए गोमती में पहुंच रही है।

बढ़ती जा रही केमिकल की खपत
लखनऊ। (4पीएम न्यूज़ नेटवर्क) जलकल के तीन वॉटर वक्र्स में आने वाले गोमती के पानी में मिट्टी, सिल्ट और कीटाणुओं की मात्रा भी मानक से ज्यादा मिली। इसे साफ करने में पिछले साल की तुलना में इस साल केमिकल की खपत और बजट दोगुना हो गया। इस साल फॉलिक एल्युमिना फेरिक की खपत 1993 मीट्रिक टन हो गई है जबकि पिछले साल 1119 मीट्रिक टन में ही काम हो गया था। इस साल अब तक 993 मीट्रिक टन का इस्तेमाल किया जा चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2016-17 में गोमती के पानी को कीटाणु मुक्त करने के लिए ब्लीचिंग पर 97 लाख और क्लोरीनेशन पर 13 लाख रुपये खर्च करने पड़े थे जबकि वर्ष 2018-19 में ब्लीचिंग का 170 लाख और क्लोरीनेशन का बजट 20 लाख के पार पहुंच गया है।

नोटिस भी बेअसर
गोमती में नालों और सीवर के अलावा पशुओं के अपशिष्टï भी बहाए जा रहे हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने नगर निगम को नोटिस भी जारी किया था लेकिन इसका कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है। नोटिस में पूछा गया था कि करोड़ों रुपये बहाने के बाद भी गोमती गंदी क्यों है?

गंभीर रोगों का बढ़ा खतरा
गोमती में फेंकी जाने वाली पॉलीथिन और इसमें गिरने वाले नाले शहरवासियों के लिए बीमारी का कारण बन सकते हैं। बलरामपुर अस्पताल के डॉ. विष्णु का कहना है कि दूषित पानी के सेवन से पेट दर्द, डायरिया, लिवर संबंधित रोग और वायरल हेपेटाइटिस समेत कई बीमारियां हो सकती हैं।

 

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