घटता भूमिगत जल, सिमटते प्राकृतिक स्रोत

सवाल यह है कि पानी की यह किल्लत क्यों उत्पन्न हुई? भूमिगत जल स्रोत सूखने क्यों लगे? जलस्रोत रिचार्ज क्यों नहीं हो पा रहे हैं? क्या अनियोजित विकास और तालाबों को पाटकर इमारतें खड़ी करने के कारण हालात बिगड़ गए हैं? क्या अंधाधुंध दोहन के कारण जलस्तर घटने लगा है? क्या जमीन के नीचे जमा पानी का खजाना खाली होने की कगार पर है?

sanjay Sharma

लखनऊ में गर्मी की तपिश के साथ पानी को लेकर हाहाकार मचने लगा है। यहां के कई इलाकों में पानी की किल्लत हो गई है। भूमिगत जलस्रोत भी दगा देने लगे हैं। कई हैंडपंप सूख गए हैं। साल-दर-साल हालात खराब होते जा रहे हैं। स्वच्छ पेयजल मिलना और भी मुश्किल हो चुका है। सवाल यह है कि पानी की यह किल्लत क्यों उत्पन्न हुई? भूमिगत जल स्रोत सूखने क्यों लगे? जलस्रोत रिचार्ज क्यों नहीं हो पा रहे हैं? क्या अनियोजित विकास और तालाबों को पाटकर इमारतें खड़ी करने के कारण हालात बिगड़ गए हैं? क्या अंधाधुंध दोहन के कारण जलस्तर घटने लगा है? क्या जमीन के नीचे जमा पानी का खजाना खाली होने की कगार पर है? क्या यह विकास की अंधी दौड़ में जलस्रोतों को नजरअंदाज करने का परिणाम है? क्या आने वाले दिनों में राजधानीवासी पानी के लिए तरस जाएंगे? क्या जल संरक्षण को लेकर सरकार गंभीर नहीं है?
राजधानी में पानी की किल्लत के कई कारण हैं। सबमर्सिबल पंपों के जरिए यहां हर दिन लाखों लीटर पानी की निकासी जमीन के नीचे से की जा रही है। यही नहीं अवैध तरीके से घरों में पंप लगाकर पानी की निकासी कर बेचा जा रहा है। अंधाधुंध निकासी का परिणाम यह है कि मोहनलालगंज, गोसाईगंज, सरोजनीनगर सहित शहरी क्षेत्र चिनहट, जानकीपुरम व विकास नगर में भूगर्भ जल स्तर लगातार खिसकता जा रहा है। यह डेंजर जोन में पहुंच चुका है। भूगर्भ जल के गिरते स्तर के लिए तालाबों को पाटकर बनाई गईं इमारतें भी हैं। राजधानी के पांच तहसील क्षेत्रों में एक दशक पहले तक 13 हजार से अधिक तालाब, झील और पोखर थे। तीन हजार से अधिक तालाब, झील और पोखर अपना वजूद खो चुके हैं। इनको पाट कर अवैध कब्जा कर लिया गया है। ये जलस्रोत बारिश के पानी के जरिए भूगर्भ जल को रिचार्ज करने का काम करते हैं। इनके वजूद के खत्म होने के कारण स्थितियां बिगड़ गई हैं। रही सही कसर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने पूरी कर दी। पेड़ अपनी जड़ों के जरिए बारिश के पानी को भूमि के नीचे पहुंचाते हैं। इस तरह एक ओर भूमिगत जल का दोहन तेज हो गया है तो दूसरी ओर वाटर रिचार्जिंग की प्राकृतिक व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया है। लिहाजा स्थितियां लगातार बिगड़ती जा रही हैं। यदि यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में जमीन के नीचे का पानी खत्म हो जाएगा और स्थितियां बदतर हो जाएगी। यदि सरकार जल संकट से निपटना चाहती है तो उसे प्राकृतिक स्रोतों का संरक्षण सुनिश्चित करना होगा। साथ ही इमारतों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को अमल में लाना होगा। वहीं पानी के अंधाधुंध दोहन को भी नियंत्रित करना होगा।

 

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