विकसित होते शहर और आम आदमी

सवाल यह है कि हम किस विकास की ओर जा रहे हैं? क्या पर्यावरण को नजरअंदाज कर हम विकास की जगह विनाश की ओर बढ़ रहे हैं? क्या अनियोजित विकास पेड़-पौधों और नदियों को निगलता जा रहा है? क्या विकास की अंधी दौड़ प्रदूषण का प्रमुख कारण बन चुका है? क्या गांवों से बढ़ रहे पलायन को रोकना जरूरी नहीं है?

Sanjay Sharma

पूरे देश में विकास का चक्र घूम रहा है। साल-दर-साल गांव सिमटते जा रहे हैं। यूपी में भी शहरों का विकास हो रहा है। यह विकास आम आदमी को सुविधाएं कम समस्याएं अधिक दे रहा है। शुद्ध हवा और पानी तक को शहरवासी तरसने लगे हैं। कई नदियों का अस्तित्व खत्म हो चुका है, कुछ का खत्म होने की कगार पर हैं। आबादी के बोझ ने शहरों को कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर दिया है। लोगों की सेहत पर इसका असर पड़ रहा है। सवाल यह है कि हम किस विकास की ओर जा रहे हैं? क्या पर्यावरण को नजरअंदाज कर हम विकास की जगह विनाश की ओर बढ़ रहे हैं? क्या अनियोजित विकास पेड़-पौधों और नदियों को निगलता जा रहा है? क्या विकास की अंधी दौड़ प्रदूषण का प्रमुख कारण बन चुका है? क्या गांवों से बढ़ रहे पलायन को रोकना जरूरी नहीं है? क्या असंतुलित विकास मनुष्य के जीवन को खतरनाक मोड़ पर नहीं पहुंचा देगा?
औद्योगिक क्रांति ने पूरे विश्व में शहरीकरण की नींव डाली। आजादी के बाद भारत में भी शहर बसाए गए। इन शहरों में तमाम सुविधाएं केंद्रित होने लगी। अच्छी स्वास्थ्य एवं शिक्षा व्यवस्था, उद्योग धंधे, व्यापार और नौकरियों की संभावनाएं शहरों में केंद्रित होती गईं। शहरों के सापेक्ष गांवों के विकास पर ध्यान नहीं दिया गया। इसका सीधा असर ग्रामीण क्षेत्रों पर पड़ा। लोग नौकरी समेत अन्य सुविधाओं के लिए शहरों की ओर पलायन करने लगे। इसने शहर और गांवों का संतुलन बिगाड़ दिया। पलायन ने गांवों का सामाजिक व आर्थिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न कर दिया। गांव से शहरों की ओर बढ़ते पलायन ने संयुक्त परिवार को ध्वस्त कर दिया। एकाकी परिवार का चलन बढ़ा। इसने व्यक्ति पर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ा दिया। लोग धन कमाने वाली मशीन बन गए। इसके अलावा विकास के केंद्र से पर्यावरण को दरकिनार कर दिया गया। नदियों में सीवर गिराया जाने लगा। कारखानों से निकले जहरीले रसायनों को नदियों में बहाया जा रहा हैं। इसने न केवल कई नदियों बल्कि इसके जलीय जीवों को भी समाप्त कर दिया। कारखानों और वाहनों से निकलने वाले धुएं ने वातावरण को प्रदूषित कर दिया। इसके कारण लोगों की सेहत खतरे में पड़ गई है। अनियोजित विकास ने पूरे देश में दो तरीके का भारत बना दिया। एक गांव में बसने वाला और दूसरा शहरों में बसने वाला। दोनों के बीच कोई संतुलन नहीं है। इसने बेरोजगारी को बढ़ावा दिया और शिक्षा के स्तर में भी गिरावट पैदा कर दी। जाहिर है अनियोजित विकास ने मनुष्य का भला कम बुरा ज्यादा किया है। यदि जल्द ही विकास को संतुलित और पर्यावरण केंद्रित नहीं किया गया तो इसका खामियाजा आने वाली पीढिय़ों को भुगतना पड़ेगा।

 

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