आचार संहिता का उल्लंघन न हो

 नवीन जोशी

आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने के कारण चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती, केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी और पूर्व मंत्री आजम खान को दो से तीन दिन तक चुनाव प्रचार करने से रोक दिया। आयोग ने यह ‘सख्त’ कार्रवाई इसलिए की, क्योंकि ये नेता चुनाव प्रचार में सांप्रदायिक भावनाएं भडक़ाने और अभद्र टिप्पणियों के दोषी पाये गये। दरअसल, इस कार्रवाई से पहले सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग से पूछा था कि धर्म और जाति के आधार पर वोट मांगकर आचार संहिता का उल्लंघन करनेवालों पर क्या कार्रवाई की जा रही है।
चुनाव आयोग की कार्रवाई से एक बात स्पष्ट है कि संवैधानिक पदों पर बैठे जिम्मेदार नेता भी अब चुनाव आचार संहिता का खुलकर उल्लंघन करने लगे हैं। छुटभैय्ये नेताओं और प्रत्याशियों की ‘जुबान फिसलने’ या जान-बूझकर जातीय-धार्मिक और व्यक्तिगत अशालीन टिप्पणियां करने के मामले चुनाव के दौरान पहले भी खूब होते थे। हाल में ऐसे

मामले न केवल बढ़े हैं, बल्कि ऐसे नेता भी आचार संहिता का उल्लंघन करने लगे हैं, जो संविधान की शपथ लेकर महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हैं। इन वरिष्ठ नेताओं से यह अपेक्षा कतई नहीं की जाती कि वे आचार संहिता का उल्लंघन करेंगे। बल्कि, उनसे अपेक्षा यह रहती है कि वे छोटे नेताओं-कार्यकर्ताओं को ऐसा करने से रोकेंगे। विडंबना देखिए कि न केवल इन्होंने भावना भडक़ानेवाले भाषण दिये, बल्कि उनमें से दो ने चुनाव आयोग की इस बारे में मिली नोटिस का जवाब तक देना उचित नहीं समझा। इन जिम्मेदार नेताओं में से एक ने भी यह नहीं माना कि उनसे गलती हुई।
योगी ने चुनाव आयोग को दिये जवाब में कहा है कि मैंने आचार संहिता का उल्लंघन किया ही नहीं। मैं तो विपक्षी नेताओं की छद्म धर्मनिरपेक्षता का पर्दाफाश कर रहा था। वहीं मायावती ने कहा कि मैंने कुछ गलत नहीं कहा, चुनाव आयोग प्रधानमंत्री के दबाव में और दलित-विरोधी मानसिकता से काम कर रहा है। इसका अर्थ है कि इन नेताओं ने जो कहा और जिसे साफ-साफ आचार संहिता का उल्लंघन माना गया, वह गलती से या भावावेश में मुंह से नहीं निकला, वह सोच-समझकर ही कहा गया। यही वह तथ्य है जो चिंताजनक है। चुनावी राजनीति आज उस जगह पहुंच गयी है, जहां आचार संहिता उल्लंघन इरादतन और वर्ग-विशेष के मतदाताओं को इंगित करके किया जाता है।

प्रत्येक चुनाव क्षेत्र का एक विशिष्ट जातीय-धार्मिक गणित है। कहीं मुसलमान मतदाता बहुतायत में हैं, कहीं सवर्ण हिंदू, कहीं पिछड़ी जातियों के वोटर ज्यादा हैं और कहीं दलित। हर पार्टी के पास इनकी उप-जातियों का गणित भी है। पूरा चुनाव इसी गणित और गोलबंदी से लड़ा जाता है। हमारी चुनाव प्रणाली की त्रासदी यह है कि मात्र 25-30 फीसदी वोट पानेवाला प्रत्याशी चुनाव जीत जाता है। एक अध्ययन के अनुसार, 70 प्रतिशत विधायक और सांसद कुल पड़े वोटों के अल्पमत से चुनाव जीतते हैंै। इसलिए सभी उम्मीदवार और प्रत्याशी जातीय-धार्मिक मतदाता समूहों को लक्ष्य करके प्रचार करते हैं। इसी जातीय-धार्मिक आधार पर प्रत्याशी भी खड़े किये जाते हैं और भाषण भी इन्हीं वोटर-समूहों को लक्ष्य करके दिये जाते हैं। पहले इतना लिहाज बरता जाता था कि खुलेआम आचार संहिता का उल्लंघन न होने पाये। चुनाव जीतने के लिए यदि कुल मतदान का पचास फीसदी से ज्यादा वोट पाना अनिवार्य कर दिया जाये। इसका एक लाभ यह होगा कि प्रत्याशियों को जातीय-धार्मिक मतदाता समूहों की बजाय क्षेत्र के सभी मतदाताओं को संबोधित करना होगा। उनके बीच लोकप्रिय होने की कोशिश करनी होगी। इस प्रयास में वह जातीय-धार्मिक आधार पर प्रचार से बचेगा। बहुमत से जीतनेवाला जनता का वास्तविक प्रतिनिधि भी होगा। प्रत्याशियों की संपत्ति और आपराधिक इतिहास के शपथ-पत्र दाखिल करना अनिवार्य करने से जो बदलाव आया था, वह निष्प्रभावी लगने लगा है।
आचार संहिता का सख्ती से पालन कराने से भी थोड़ा फर्क पड़ता है, लेकिन जातीय और सांप्रदायिक आधार पर चुनाव लडऩे की बढ़ती प्रवृत्ति को थामने के लिए कुछ बड़े सुधारों की जरूरत होगी। लोकतंत्र की शक्ति के लिए चुनाव की शुचिता को बनाये रखना जरूरी है, लेकिन एक लोकतांत्रिक देश के ताने-बाने को अक्षुण्ण रखना उससे ज्यादा जरूरी है।

 

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