चिकित्सा व्यवस्था पर कोर्ट की सख्ती और सवाल

सवाल यह है कि जनहित से जुड़े मुद्दों पर कोर्ट को ही दिशा-निर्देश क्यों देने पड़ते हैं? क्या जनता के प्रति सरकारों की कोई जवाबदेही नहीं है? हर साल करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद चिकित्सा सेवाओं में सुधार क्यों नहीं हो रहा है? अस्पतालों में चिकित्सकों, जांच उपकरणों और दवाओं का टोटा क्यों पड़ा रहता है? गंभीर मरीजों के लिए जरूरी वेंटिलेटर पर्याप्त संख्या में क्यों नहीं हैं?

Sanjay Sharma

प्रदेश की लचर चिकित्सा व्यवस्था पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। लखनऊ के तमाम सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर के अभाव में मरीजों की मौत को लेकर दाखिल की गई एक जनहित याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने प्रदेश के कई अफसरों से जवाब-तलब किया है। सवाल यह है कि जनहित से जुड़े मुद्दों पर कोर्ट को ही दिशा-निर्देश क्यों देने पड़ते हैं? क्या जनता के प्रति सरकारों की कोई जवाबदेही नहीं है? हर साल करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद चिकित्सा सेवाओं में सुधार क्यों नहीं हो रहा है? अस्पतालों में चिकित्सकों, जांच उपकरणों और दवाओं का टोटा क्यों पड़ा रहता है? गंभीर मरीजों के लिए जरूरी वेंटिलेटर पर्याप्त संख्या में क्यों नहीं हैं? क्या भ्रष्टïाचार ने सरकारी चिकित्सा व्यवस्था का दम घोंट दिया है? क्या सरकार लचर चिकित्सा व्यवस्था को सुधारने में नाकाम साबित हो रही है? क्या मरीजों की जान से खिलवाड़ करने की छूट दी जा सकती है?
यह देश की विडंबना है कि जनहित के मुद्दों पर लोगों को कोर्ट की शरण लेनी पड़ती है। कोर्ट के आदेश के बाद ही यहां की सरकारी मशीनरी काम करती है अन्यथा वह आंख बंद किए रहती है। लखनऊ समेत पूरे प्रदेश में चिकित्सा सेवाएं पटरी से उतर चुकी हैं। लखनऊ के तमाम सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी है। यहां मरीजों को आधी-अधूरी दवाएं मिलती हैं। अत्याधुनिक जांच मशीनों का अभाव है। कई बड़े अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सक तक नहीं हैं। इसके कारण गरीब मरीजों को सही इलाज नहीं मिल पा रहा है। अस्पतालों में न तो कर्मचारी और न ही चिकित्सक समय पर आते हैं। पंजीकरण कराने से लेकर डॉक्टर से सलाह लेने तक मरीजों को घंटों कतार में खड़े रहना पड़ता है। ऑपरेशन से लेकर जांच तक के लिए एक-एक महीने का इंतजार करना पड़ता है। ग्रामीण इलाकों की हालत और भी खराब है। प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र शोपीस बनकर रह गए हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र केवल टीकाकरण केंद्र में तब्दील हो गए है। अधिकांश सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सक नदारद रहते हैं। ऐसी स्थिति में लोग इलाज के लिए जिला अस्पताल पहुंचते हैं। इसके कारण यहां मरीजों की भीड़ बढ़ जाती है। भ्रष्टïाचार का आलम यह है कि चिकित्सा उपकरण से लेकर दवाओं की खरीद तक में गोलमाल किया जाता है। यह स्थिति तब है जब सरकार ने बेहतर इलाज उपलब्ध कराने के निर्देश दे रखे हैं। ऐसे में हाईकोर्ट की सख्ती चिकित्सा अधिकारियों के लिए निश्चित रूप से एक सबक के रूप होगी। वहीं सरकार को भी चाहिए कि वह चिकित्सा व्यवस्था को दुरुस्त करे।

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