बुलेट पर जनता के वोट की चोट

सवाल यह है कि क्या मतदाताओं ने वोट की चोट से नक्सलियों, आतंकवादियों और अलगाववादियों को सबक सिखाने का काम किया है? क्या हिंसा के जरिए देश के लोकतंत्र को पंगु बनाया जा सकता है? क्या जनता के जज्बे को बंदूक की गोली रोक सकती है? क्या लोग लोकतंत्र को बाधित करने वाले हर तत्व का सफाया करने पर उतारू हैं?

SAnjay Sharma

लोक तंत्र के महापर्व का आगाज हो चुका है। सात चरणों में हो रहे लोक सभा चुनाव के प्रथम चरण में बीस राज्यों के 91 सीटों पर मतदान हो चुका है। मतदाताओं ने प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम में कैद कर दी है। छत्तीसगढ़ की बस्तर सीट पर नक्सलियों की धमकी के बावजूद भारी संख्या में लोगों ने मतदान किया। वहीं आतंकियों और अलगाववादियों को नजरअंदाज कर जम्मू-कश्मीर की जनता ने यहां की दो सीटों पर पूरे जोश के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग किया। मतदाताओं के जोश ने साफ कर दिया कि बंदूक के बल पर लोक तंत्र के महापर्व को मनाने से रोका नहीं जा सकता है। सवाल यह है कि क्या मतदाताओं ने वोट की चोट से नक्सलियों, आतंकवादियों और अलगाववादियों को सबक सिखाने का काम किया है? क्या हिंसा के जरिए देश के लोकतंत्र को पंगु बनाया जा सकता है? क्या जनता के जज्बे को बंदूक की गोली रोक सकती है? क्या लोग लोकतंत्र को बाधित करने वाले हर तत्व का सफाया करने पर उतारू हैं? क्या कश्मीर में अलगाववादी और आतंकवादी बेअसर हो चुके हैं? क्या जम्मू-कश्मीर में चुनावों को बाधित करने के पाकिस्तान के मंसूबों पर जनता ने पानी फेर दिया है?
देश के कुछ राज्यों में देश विरोधी ताकतें सक्रिय हैं। छत्तीसगढ़ में नक्सली समानांतर सरकार चलाते हैं। कई वर्षों की मशक्कत के बाद रमन सरकार नक्सलियों को नियंत्रित कर सकी थी। तमाम नक्सली आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में शामिल हो गए थे, लेकिन भूपेश सरकार के गठन के बाद नक्सली फिर सक्रिय हो गए हैं। पिछले कुछ दिनों से वे कई इलाकों में ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं। नक्सलियों ने भाजपा के एक विधायक पर हमला किया। हमले में चार जवान शहीद हो गए और भाजपा विधायक की मौत हो गई। नक्सलियों ने जनता को बस्तर लोक सभा सीट पर होने वाले मतदान में भाग न लेने अन्यथा अंजाम भुगतने की धमकी दी थी लेकिन जनता ने धमकी को दरकिनार कर बड़ी संख्या में मतदान किया। बस्तर में करीब 57 फीसदी मतदान हुआ। वहीं जम्मू-कश्मीर की दो सीटों जम्मू और बारामूला में मतदान हुआ। अलगाववादियों ने इस मतदान के बहिष्कार का ऐलान किया था। ये अलगाववादी आतंकियों को संरक्षण देते हैं। मतदान में भाग लेकर जम्मू-कश्मीर के लोगों ने आतंकियों और पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं को संदेश दे दिया है कि वे किसी गोली से डरने वाले नहीं है। साफ है कि हिंसा से लोकतंत्र को दबाया नहीं जा सकता और जब भी देश की जनता को जरूरत समझ आएगी वह आतंकियों और नक्सलियों की बंदूक की गोली का जवाब वोट की चोट से देती रहेगी। यही लोकतंत्र की खूबसूरती भी है।

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