नव भारत निर्माण के धनस्रोत

११ प्रभु चावला

लोकसभा चुनाव के माहौल में चहुंओर वायदों और उपलब्धियों की सियासत का शोर होने लगा है। शायद ही कोई पार्टी हो, जो मतदाताओं को किसी न किसी रूप में रिश्वत की पेशकश न कर रही हो। इसके बावजूद, नैतिकता का दिखावा असाध्य रोग के रूप में बार-बार उभर आता है और प्रत्येक पार्टी दूसरे पर ऐसे वायदों का आरोप लगाती है, जिन्हें कभी पूरा नहीं किया जा सकता। कांग्रेस ने हर छोटे किसान के खाते में छह हजार रुपये सालाना भेजने के वायदे के लिए प्रधानमंत्री मोदी का मजाक उड़ाते हुए इस रकम का स्रोत बताने की चुनौती दी थी। मोदी ने उस स्रोत की तलाश कर ली। फिर जब राहुल ने अपनी रेवड़ी का बम फोड़ा, तो उसके स्रोत पर सवाल खड़े करने की बारी भाजपा की थी।
कांग्रेस ने भाजपा को चुनौती दी कि वह किसान कल्याण, स्वास्थ्य योजनाओं एवं उन अन्य वायदे पूरे करने के लिए पैसे का स्रोत बताये, जो बजट के दायरे से बाहर हैं। अब कांग्रेस के मैनिफेस्टो ने इस देश में एक सार्थक बहस की शुरुआत कर दी है, जो भारत की निर्धन आबादी के लिए कल्याणकारी निधि उगाहने को लेकर सरकार की क्षमता तथा उसकी भूमिका पर आधारित है। वर्ष 2019 के आम चुनाव अधकचरे समाजवाद एवं सरकार पोषित पूंजीवाद के लुभावने घालमेल हैं। बैंकों से कर्ज लेकर पचा जानेवाले पूंजीपतियों में से जहां कुछ को छोड़ ज्यादातर अपनी कंपनियों के दिवालिया हो जाने के बाद भी खुद विलासिताभरी जिंदगी जी रहे हैं, वहीं देश के गरीब अभावपूर्ण जीवन जीने को अभिशप्त हैं। पर चूंकि वे बड़ी संख्या में वोट देने निकलते हैं, सो अभी वे सबकी आंखों के तारे बने बैठे हैं, जिन्हें लुभाने को सभी सियासतदां समृद्धि के सौदागरों का स्वांग किये फिर रहे हैं। जब यह जरूरत खत्म हो जायेगी, तो एक बार फिर वे निहित स्वार्थों के आगोश में समाकर मु_ीभर धन्नासेठों की तिजोरियां भरने के उपाय रचने लगेंगे। आज देश की राजनीति में दशकों बाद वह दौर आया है, जब गरीबों के मध्य मांग सृजन का बोलबाला बना है। भारतीय स्टॉक बाजार आय की बड़ी असमानताओं के पोषक हैं। वर्ष 1991 में जब बाजार का उदारीकरण लागू हुआ, तब से ही कंपनी प्रवर्तकों, बैंकरों, विदेशी संस्थागत निवेशकों एवं सटोरियों ने इस कर मुक्त पूंजीलाभ के भरपूर फायदे उठाये हैं।
नया भारत तब तक एक हकीकत में तब्दील नहीं हो सकता, जब तक सरकार राजकोषीय विवेक के द्वारा अथवा धनाढ्यों से नये भारत के लिए विकासमूलक कर का भरपूर संग्रहण नहीं करती है। यहां की उदार कर प्रणाली का लाभ उठाते हुए भारतीय प्रवर्तकों ने उन कंपनियों के अपने शेयर बेचकर, जिनमें वे अथवा उनके पूर्वज कभी प्रवर्तक थे, अकूत दौलत इकट्ठा कर ली है। अभी शायद ही कोई ऐसा मूलप्रवर्तक बचा है, जिसके पास अपनी कंपनियों के स्टॉक में बहुसंख्यक शेयर हों। ऐसे उदार माहौल ने डॉलर करोड़पतियों और अरबपतियों की कतारें खड़ी कर दीं, जिनमें एक हजार से अधिक स्वदेशी एवं भारतीय पासपोर्ट धारक अनिवासी भारतीय ऐसे हैं, जिनका सम्मिलित शुद्ध मूल्य (नेट वर्थ) 200 अरब डॉलर से भी ज्यादा है। इनके शुद्ध मूल्य में जोड़ी जा रही हरेक दौलत पर पांच प्रतिशत वार्षिक की दर से ‘नया भारत अधिभार’ लगना चाहिए। खुले बाजार तथा उदार आयात नीति ने केवल एक दशक के दौरान देश में विदेशी सुपरकारों, जेटों, याटों, मनोरंजन उपकरणों, तथा महंगे ऑफिस एवं आवास साज-सज्जा जैसी विलासिता सामग्रियों एवं सेवाओं की खपत एक हजार प्रतिशत से भी ज्यादा बढ़ा दी। देश की विमानन कंपनियों की सम्मिलित विमान संख्या से भी अधिक आज देश में निजी जेटों की संख्या है। विलासिता सामग्रियों पर आयात कर एवं जीएसटी 30 प्रतिशत से कम नहीं होना चाहिए। निजी जेटों के उपयोग पर एक सीमा रेखा अवश्य तय की जानी चाहिए और उसके ऊपर के उपयोग को कर दायरे में लाया जाना चाहिए। सौ करोड़ रुपये से अधिक विक्रय करनेवाली कंपनियों पर सिर्फ एक प्रतिशत टर्न ओवर कर लगाकर भी सरकार सालाना 40 हजार करोड़ रुपये से अधिक राजस्व अर्जित कर सकती है।
जहां चाह, वहां राह। यदि भारत एक भेदभावरहित कर प्रणाली अपना ले, तो समग्र विकास का एक मॉडल विकसित कर पाना हमारे बूते के बिल्कुल अंदर है। हर चुनाव देश के निर्धनों को भ्रमित कर जाता है। हमें एक ऐसे राजकोषीय ढांचे की बड़ी शिद्दत से जरूरत है, जो धनाढ्यों द्वारा देने और वंचितों को सशक्त करने पर आधारित हो। जब तक सियासी पार्टियां संपदा तथा अवसरों का समतामूलक वितरण सुनिश्चिित नहीं करतीं, ‘नया भारत’ केवल एक नारा ही बना रहेगा।

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