ऑनलाइन गेम की गिरफ्त में बच्चे

आशुतोष चतुर्वेदी

हम लोगों को इस बात का एहसास नहीं है कि टेक्नोलॉजी युवा पीढ़ी को कितनी तेजी से अपनी गिरफ्त में लेती जा रही है। पिछले दिनों एक बेहद चिंताजनक खबर आयी कि हैदराबाद के मलकाजगिरी में एक 16 वर्षीय लडक़े को ऑनलाइन गेम पबजी (प्लेयर अननोन्स बैटलग्राउंड्स) खेलने को लेकर मां ने डांटा, तो उसने आत्महत्या कर ली। मां-बाप ने पुलिस को दिये बयान में कहा है कि बच्चे का अगले दिन अंग्रेजी का इम्तिहान था और वह पबजी खेल रहा थ। इस पर मां ने उसे डांटा। इतनी-सी बात पर बच्चे ने पंखे से लट कर जान दे दी। अगर आप पबजी से नावाकिफ हों, तो बता दूं कि यह ऑनलाइन गेम है। इसमें हिस्सा लेने वाले खिलाड़ी को खुद को जीवित रखने और गेम जीतने के लिए दूसरों को मारना पड़ता है।
ये गेम आपको एक ऐसी आभासी दुनिया में ले जाता है, जहां गोलियों की बौछारों के बीच आपको अपने खिलाड़ी को जिंदा रखना होता है। यह हिंसक खेल बच्चों और किशोरों को अपनी गिरफ्त में एक लत के रूप में लेता जा रहा है। पिछले दिनों खबर आयी कि महाराष्ट्र में रेल ट्रैक पर खड़े होकर फोन पर पबजी खेल रहे दो नवयुवकों की ट्रेन से कट कर मौत हो गयी थी। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के दसवीं का एक छात्र इस खेल के चक्कर में अपना घर छोड़ कर चला गया। मुंबई के कुर्ला इलाके में एक युवक ने इसी के कारण अपनी जान दे दी थी। छिंदवाड़ा में एक युवक पबजी खेलने में इतना व्यस्त था कि उसने पानी की जगह एसिड पी लिया था। गनीमत थी कि एसिड ज्यादा प्रभावी नहीं था। दुनियाभर में 40 करोड़ बच्चे और युवा इस गेम को हर दिन खेल रहे हैं। अनुमान है कि भारत में भी इनकी संख्या करोड़ों में होगी। चीन ने 13 साल तक के बच्चों के लिए इसे खेलने पर पाबंदी लगा दी है। भारत में गुजरात एकमात्र ऐसा राज्य है, जिसने इस पर पाबंदी लगाई है। गुजरात के राजकोट और अहमदाबाद में पबजी गेम खेलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। यहां मोबाइल पर पबजी गेम खेलने के आरोप में दस नवयुवकों को हिरासत में भी लिया गया था, जिन्हें बाद में रिहा कर दिया गया। अनेक शिक्षण संस्थानों ने भी पबजी गेम खेलने में प्रतिबंध लगा दिया है। ये घटनाएं हम सभी के लिए खतरे की घंटी है और इन पर तत्काल गौर करने की जरूरत है। दुनियाभर में पबजी पर प्रतिबंध की मांग उठ रही है। कोई गेम यदि बच्चों की जान के लिए खतरा बन जाए, तो उस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करना ही होगा।
दुनिया में ऐसी अनेक कंपनियां हैं केवल युवाओं के लिए गेम ही बनाती हैं। यह करोड़ों डॉलर का धंधा है। कुछेक गेम का दुष्प्रभाव यह है कि वह लत बन जाता है। बच्चे दिन रात ऑनलाइन गेम में लगे रहते हैं। उनके सोना-जागना, पढऩा-लिखना और खान-पान सब प्रभावित हो जाता है और वे बेगाने से हो जाते हैं। इसके लिए कुछ हद तक माता-पिता भी दोषी हैं। मां-बाप को लगता है कि वे बच्चों को संभालने का सबसे आसान तरीका सीख गये हैं। दो-ढाई साल की उम्र के बच्चे को कहानी सुनाने की बजाय मोबाइल पकड़ा दिया जाता है। हमें नयी परिस्थितियों से तालमेल बिठाने के विषय में सोचना होगा। यह समस्या पूरी दुनिया की है। कई देशों ने समस्या का समाधान निकालने की दिशा में कदम उठाने शुरू भी कर दिये हैं। जापान में तो जब बच्चे जरूरत से ज्यादा समय किसी गेम पर बिताते हैं, तो कंप्यूटर अथवा मोबाइल पर अपने आप चेतावनी सामने आ जाती है, लेकिन भारत में अब तक इस दिशा में कोई विचार नहीं हुआ है। शायद आपने गौर नहीं किया कि टेक्नोलॉजी ने आपके बच्चे में बहुत परिवर्तन कर दिया है। मोबाइल और इंटरनेट ने बच्चों का बचपन छीन लिया है। उसके सोने, पढऩे के समय, हाव भाव और खान-पान सब बदल चुका है। हम या तो आंख मूंदे हैं या इसे स्वीकार नहीं करते है। लेकिन आपके रोकने से ये परिवर्तन रुकने वाले नहीं है। थोड़ा करीब से देखें तो पायेंगे कि आज के बच्चे बदल चुके हैं। आप सुबह पढ़ते थे, बच्चा देर रात तक जगने का आदी है। यह व्हाट्सएप की पीढ़ी है। पहले माना जाता था कि पीढिय़ां 20 साल में बदलती है, उसके बाद तकनीक ने इस परिवर्तन को 10 साल कर दिया और अब नयी व्याख्या है कि पांच साल में पीढ़ी बदल जाती है। इसका मतलब यह कि पांच साल में दो पीढिय़ों में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाता है। अब बच्चे किशोर, नवयुवक जैसी उम्र की सीढिय़ां चढऩे के बजाय सीधे वयस्क बन जाते हैं।
सबसे भयावह यह है कि बच्चों में माता-पिता को लेकर अविश्वास का भाव उत्पन्न हो रहा है जो बेहद चिंताजनक है। एक बात और मैंने नोटिस की कि माता-पिता भी बच्चे से कुछ कहने से डरते हैं कि वह कहीं कुछ कर न ले। एक गंभीर संवादहीनता की स्थिति निर्मित होती जा रही है। किसी भी समाज और देश के लिए यह बेहद चिंताजनक है।

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