स्वच्छता अभियान के दावे और हकीकत

सवाल यह है कि स्वच्छता के नाम पर सरकार की ओर से हर साल जारी होने वाला करोड़ों का बजट आखिर कहां खर्च हो रहा है? क्या स्वच्छता अभियान भ्रष्टïाचार की भेंट चढ़ चुका है? कूड़ा निस्तारण की समुचित व्यवस्था आज तक क्यों नहीं हो पाई? हजारों सफाई कर्मी क्या कर रहे हैं?

Sanjay Sharma

यूपी में स्वच्छता अभियान के दावे हकीकत में तब्दील होते नहीं दिख रहे हैं। राजधानी लखनऊ समेत तमाम शहर इन दावों की पोल खोल रहे हैं। सडक़ों से लेकर गलियों तक में कूड़े के ढेर लगे हैं। कूड़े के समुचित निस्तारण की व्यवस्था तक नहीं है। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी लखनऊ की सफाई और कूड़ा निस्तारण व्यवस्था से असंतुष्टï हैं। सवाल यह है कि स्वच्छता के नाम पर सरकार की ओर से हर साल जारी होने वाला करोड़ों का बजट आखिर कहां खर्च हो रहा है? क्या स्वच्छता अभियान भ्रष्टïाचार की भेंट चढ़ चुका है? कूड़ा निस्तारण की समुचित व्यवस्था आज तक क्यों नहीं हो पाई? हजारों सफाई कर्मी क्या कर रहे हैं? क्या स्वच्छता जागरूकता अभियान बेअसर हो गया है? क्या इस सबके लिए नगर निगम जिम्मेदार नहीं है? क्या ऐसे ही राजधानी को स्वच्छ, सुंदर और स्मार्ट बनाया जा सकता है?
उत्तर प्रदेश के तमाम शहरों की सफाई व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। शहरों को स्वच्छ और सुंदर बनाने की जिम्मेदारी नगर निगम और नगर पालिकाओं को सौंपी गई है लेकिन ये भ्रष्टïाचार और राजनीति के अखाड़ों में तब्दील हो चुके हैं। लिहाजा करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद स्थितियों में कोई सुधार होता नहीं दिख रहा है। राजधानी लखनऊ की हालत इसकी एक बानगी भर है। यहां सडक़ों और गलियों में गंदगी का आलम रहता है। डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन की व्यवस्था भी ध्वस्त हो चुकी है। कुछ पॉश इलाकों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश क्षेत्रों में कूड़ा कलेक्शन करने के नाम पर खानापूर्ति की जाती है। यही नहीं सडक़ किनारे रखे गए कूड़ेदानों से नियमित कूड़ा उठान नहीं किया जाता है। यह हाल तब है जब कूड़ा उठान के लिए अलग से बजट दिया गया है। ईंधन के नाम पर खेल किया जाता है। कूड़े के निस्तारण की समुचित व्यवस्था नहीं हो सकी है। कूड़ा निस्तारण के लिए यहां महज एक प्लांट है। सफाई कर्मी खुलेआम सडक़ों पर कूड़ा जला देते हैं। इसके अलावा दुकानदार भी सडक़ों पर कूड़ा बिखरने का काम कर रहे हैं। यही वजह है कि स्वच्छता सर्वेक्षण में लखनऊ फिसड्डी साबित हो चुका है। इसकी रैकिंग लगातार गिरती जा रही है। हालांकि नगर निगम के जिम्मेदार लखनऊ को स्वच्छता के मामले में इंदौर बनाने का दावा करते नहीं थक रहे थे। सरकार यदि लखनऊ समेत अन्य शहरों को स्वच्छ बनाना चाहती है तो उसे संबंधित विभागों में व्याप्त भ्रष्टïाचार को समाप्त करना होगा। साथ ही अधिकारियों-कर्मचारियों को जवाबदेह भी बनाना होगा। अन्यथा स्वच्छता अभियान के दावे ही होते रहेंगे, यह हकीकत में शायद ही कभी तब्दील हो सकें।

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