ध्यान में रहे भारत का हित

मृणाल पांडे

बालाकोट के बाद का लगातार उन्माद से भरा चुनावी मंजर राजनेताओं के मनोविज्ञान में रुचि रखनेवालों के लिए दिलचस्प मसाला है। चुन-चुन के बदला लेंगे और घर में घुसकर मारूंगा वाले बयानों ने सोचे-समझे बगैर भारत और पाक ही नहीं भारत-पाक एवं चीन, भारत-पाक एवं अमेरिका के रिश्तों के कई उत्पाती प्रेतों को आजाद कर दिया है। भारतीय राजनय के स्वरूप पड़ोसी रिश्तों महाशक्तियों की छुपी इच्छाओं और इरादों से गढ़ी जा रही एशियाई बिसात की रणनीतियों पर भी इसका कुप्रभाव पड़ रहा है। जिस एक बात पर दो विश्वयुद्धों से झुलस चुकी दुनिया एकमत है, वह यह है कि परमाणु शक्ति वाले दो देशों के बीच युद्ध छिडऩा या तनावभरी स्थिति में भडक़ाऊ तरह से घी डालना विश्वभर के लिए खतरा है, इसलिए बालाकोट की आग पर ढक्कन लगाने को तुरंत सारी दुनिया हरकत में आ गयी और सेनाधिपति कगार से पीछे हट गये।
सवाल है कि ऐन चुनावी संध्या पर पाकिस्तान भला भारत की सीमा पर बार-बार हंगामा क्यों मचा रहा है। इसकी बड़ी वजह है एशिया पर एकछत्र राज्य करने के इच्छुक चीन की दीर्घकालिक नीतियां, चीन की विदेश नीति में दर्शन और खुराफात का एक अजीब मिश्रण है। उसने ताओ से माओ तक दर्शन का पारायण करके अपने अगली सदी के भूराजनीतिक लक्ष्य तय किये हैं, जिनमें भारत के खिलाफ जरूरत पडऩे पर पाकिस्तान को अपनी मिसाइल बनाना शामिल है। चीन ठोस खुर्राट और व्यावहारिक बनकर पाक धरती पर अपने व्यापारिक सामरिक हितों के तहत सडक़ों से लेकर बंदरगाह तक बनाने के कार्यक्रम पर चुस्ती से अमल कर रहा है। हमारा मामला उल्टा है। हमारे नेता दूरगामी फल की चिंता किये बिना फौरी चुनावी जरूरतों से ही लक्ष्य तय कर हमले पर उतारू हो जाते हैं। राष्ट्रवादी भाषणों की आग से शुरुआत होती है। यहां तक तो तब भी ठीक है, दिक्कत तब शुरू होती है जब प्रधान सेवक ही देश के हर सूबे में पाक और अल्पसंख्यकों के खिलाफ उन्माद जगाते जनता को हिंसक संदेशों से उकसाते हैं। हमको अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि आज आतंकवाद के खिलाफ खुला युद्ध छेडक़र पाक से सामरिक टकराव मोल लेना चीन को हस्तक्षेप के लिए न्योतना साबित होगा। इस क्रम में हमको रूस के पारंपरिक समर्थन की आस भी नहीं पालनी चाहिए। हम नहीं मान सकते कि चीन के बूते पाक अगर हम पर हमलावर हुआ तो उसके खिलाफ हमको ट्रंप का नस्लवादी, संकुचित घरेलू स्वार्थों का रक्षक बनता जा रहा अमेरिका रक्षा की गारंटी देगा। उसके खुद अपने खरबों डॉलर चीन में निवेशित हैं। आज युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद सरकार की घरेलू और वैदेशिक नीतियों की असफलता पर पर्दा डालने के हिंदुत्व की परंपरा के रक्षण का हिस्साभर है। बार-बार वही सतयुग, द्वापर युग के मुहावरों में सौ साल लडऩे, सिर काट लाने, एक के बदले सवा सौ मारने की बातें बेरोजगारी, कृषि की बदहाली और छीजते पर्यावरण की ठोस सच्चाइयों से घिरे देश को न सिर्फ उबाती हैं बल्कि उसकी उल्टी प्रतिक्रिया भी संभव है। हमको अगले सौ पचास सालों में तरक्की करनी है, इसके लिए विश्वविमुख बड़बोले आलसियों की जमात से बाहर आकर भारत की चिंताजनक सामाजिक आर्थिक सचाइयों पर जारी उन ठोस आंकड़ों का सच हमको स्वीकार करना होगा। जिनको हमारे अनुभव संपन्न राष्ट्रीय शोध संस्थान सामने ला रहे हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच जो रिश्ता है वह पिछले हजार बरस के भारतीय इतिहास से ही निकला है। इन रिश्तों का इतिहास जितना हमको खींचता है उतना ही पाक को भी। दोनों के बीच युद्ध हुआ तो वह ऊपरी तौर से भले ही अंतरराष्ट्रीय युद्ध होगा पर एक गहरे मायने में वह एक गृहयुद्ध भी होगा जो सीमा के आर-पार दोनों देशों में अंधी अराजकता को कस्बों-गलियों में बिखरा देगा। इतिहास का पेंडुलम भारत में बहुत कम घूमा है। हमारे यहां ऐसे शस्त्रास्त्र थे, ऐसे उडऩखटोले और मिसाइलें थीं, इस तरह की अवैज्ञानिक सबूतविहीन बातों पर बोलने के व्यावहारिक नतीजे क्या हैं। आज अगर सचमुच युद्ध हुआ तो उन पांच हजार साल पुराने युद्ध के नुस्खों को हम क्या साकार कर सकेंगे। इसका जवाब शायद सिर्फ रहस्यवाद के लेवल पर दिया जा सकता है पर हथियारों की क्षमताए वाजिब कीमत या सेना की तैयारी से जुड़े वाजिब व्यावहारिक सवालों को लेकर राजकीय असहिष्णुता हमारे राजनय की असफलता और एशिया में हमारा अकेलापन जताती है। क्या यह विडंबना नहीं कि जहां राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में निहत्थे नागरिकों को घर में घुसकर मारना नितांत संभव बनता जा रहा है, कश्मीर पर पिछले पांच बरसों में जुआ खेलते-खेलते 2019 में दांव कितने ऊंचे होते जा रहे हैं और चुनावी खेल में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की नीयत से अगर पड़ोस पर हमला कर दिया गया, तो वह भारत के विश्व हितों को कितना नुकसान पहुंचा सकता है।

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