एकीकरण से बैंकिंग व्यवस्था को मजबूती

जयंतीलाल भंडारी

एक अप्रैल को बैंक ऑफ बड़ौदा में विजया बैंक और देना बैंक के विलय के बाद भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में बैंक ऑफ बड़ौदा दूसरा सबसे बड़ा बैंक बन गया है। इस एकीकरण के बाद बैंक ऑफ बड़ौदा के पास 9500 से अधिक शाखाएं, 13400 से अधिक एटीएमए, 85000 से अधिक कर्मचारी हो गए हैं। इस एकीकरण के बाद बैंक ऑफ बड़ौदा 120 मिलियन से अधिक ग्राहकों को सेवाएं प्रदान करेगा। बैंक ऑफ बड़ौदा के पास 15 लाख करोड़ से अधिक मिश्रित कारोबार होगा।
बैंक ऑफ बड़ौदा में विजया बैंक और देना बैंक के विलय के बाद देश और दुनिया के अर्थ विशेषज्ञ इसे बड़े एवं मजबूत सरकारी बैंक के रूप में एक लाभप्रद कदम बढ़ाते हुए दिखाई दे रहे हैं। पिछले दिनों वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारत में सरकार द्वारा छोटे-छोटे बैंकों के एकीकरण से बड़े और मजबूत बैंक बनाया जाना देश के बैंकिंग परिदृश्य की जरूरत है। यह भी कहा गया है कि सरकार के द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में जो अतिरिक्त पूंजी डाली जा रही है, उससे बैंकों में फंसे कर्ज (एनपीए) के लिए प्रावधान में सुधार लाने में मदद मिलेगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2019 के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को बहुत ज्यादा बाहरी पूंजी की जरूरत नहीं होगी। केन्द्रीय वित्त मंत्रालय ने भी कहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का बुरा समय समाप्त होने जा रहा है।
ऐसे में देश और दुनिया के अर्थ विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार द्वारा छोटे और कमजोर बैंकों के साथ मजबूत बैंकों का एकीकरण देश की जरूरत है। छोटे-छोटे सरकारी बैंकों का एकीकरण तथा सरकारी बैंकों में पुनर्पूंजीकरण का कदम एक बड़ा बैंकिंग सुधार है। इससे सरकारी बैंकों को दोबारा सही तरीके से काम करने का अच्छा मौका मिल रहा है। इससे बैंकिंग व्यवस्था मजबूत बन रही है। पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने और इसमें नयी जान फूंकने के लिए बैंकिंग क्षेत्र की हालत को पर्याप्त पुनर्पूंजीकरण से बेहतर करना सबसे पहली जरूरत है। इसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एकीकरण दूसरी जरूरत है। आईएमएफ ने कहा है कि भारत को इसके लिए गैर-निष्पादित आस्तियों के समाधान को बढ़ाना होगा तथा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ऋण वसूली प्रणाली को बेहतर बनाना होगा। चूंकि सरकार की जनहित योजनाएं सरकारी बैंकों पर आधारित हैं, ऐसे में मजबूत सरकारी बैंकों की जरूरत स्पष्ट दिखाई दे रही है।
देश भर में चल रही विभिन्न कल्याणकारी स्कीमों के लिए धन की व्यवस्था करने और उन्हें बांटने की जिम्मेदारी सरकारी बैंकों को सौंप दी गई है। सरकारी बैंकों के द्वारा एक ओर मुद्रा लोन, एजुकेशन लोन और किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए बड़े पैमाने पर कर्ज बांटा जा रहा है वहीं दूसरी ओर बैंकरों को लगातार पुराने लोन की रिकवरी भी करनी पड़ रही है। परिणामस्वरूप बैंक ऑफिसर अपने मूल काम यानी कोर बैंकिंग के लिए बहुत कम समय दे पा रहे हैं। चूंकि बीमा या सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ लेने के लिए बैंक खाता जरूरी है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्र में बैंकिंग सुविधाओं की भारी कमी है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2018 तक जन धन योजना के तहत 31.44 करोड़ खाते हैं। 2014 से 2017 के बीच दुनिया में 51 करोड़ खाते खुले, जिसमें से 26 करोड़ खाते केवल भारत में जन-धन योजना के अंतर्गत हैं। भारत में इस अवधि में 26 हजार नई बैंक शाखाएं भी खुली हैं। ऐसे में भारत की नयी बैंकिंग जिम्मेदारी बैंकों के निजीकरण से संभव नहीं है। अतएव ऐसी जिम्मेदारी मजबूत सरकारी बैंक के द्वारा ही निभाई जा सकती है।
दो वर्षों से मजबूत सरकारी बैंकों के लिए लगातार प्रयास आगे बढ़ते रहे हैं। 23 अगस्त 2017 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सार्वजनिक बैंकों के एकीकरण में तेजी लाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इस कवायद का मकसद सरकारी बैंकों को सुदृढ़ करना है। सरकार की रणनीति अगले 3 वर्षों में वर्तमान 21 सरकारी बैंकों की संख्या घटाकर 10 से 12 करने की है। उल्लेखनीय है कि छोटे बैंकों को बड़े बैंक में मिलाने का फार्मूला केंद्र सरकार पहले भी अपना चुकी है। कोई दो वर्ष पहले एक अप्रैल 2017 को एसबीआई के पांच सहायक बैंकों और भारतीय महिला बैंक का एसबीआई में विलय किया गया है। भारत में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जैसे बड़े बैंकों में सहायक बैंकों के विलय से उद्योग कारोबार व विभिन्न वर्गों की कर्ज की बड़ी जरूरत पूरी हुई है। नि:संदेह सार्वजनिक क्षेत्र के छोटे और कमजोर बैंकों का एकीकरण देश के नए बैंकिंग दौर की जरूरत है।

 

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