संविधान के संरक्षक द्वारा आचार संहिता का उल्लंघन!

१११ एनके सिंह
जांच के बाद राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह को चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन का दोषी पाया लेकिन उसके ही नहीं कानून के हाथ बंधे हुए हैं। लिहाजा आयोग अब राष्ट्रपति के संज्ञान में यह दोष लाने के आशय से पत्र लिखेगा। भारत के संविधान में सिर्फ दो पद राष्ट्रपति और राज्यपाल ऐसे हैं जो संविधान के संरक्षण, अभिरक्षण और परिरक्षण की शपथ लेते हैं जबकि अन्य सभी प्रधानमंत्री हों या भारत के मुख्य न्यायाधीश संविधान में निष्ठा की शपथ लेते हैं। यही वजह है कि इन दोनों महामहिमों पर कार्यकाल के दौरान कोई मुकदमा नहीं चल सकता। इन दोनों पदों की एक गरिमा होती है लिहाजा जब 1993-94 में हिमाचल के तत्कालीन राज्यपाल गुलशेर अहमद को अपने प्रत्याशी बेटे के प्रचार का दोषी पाया गया तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ा? क्या बड़े महामहिम छोटे महामहिम पर ऐसा दबाव आम चुनाव के वक्त डालेंगे ?
चुनाव आयोग ने नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार से दो दिनों के भीतर जवाब मांगा था लेकिन इस छोटे से जवाब के लिए भी उपाध्यक्ष महोदय ने और समय मांगा। इस अधिकारी ने ट्वीटर और साक्षात्कार में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के न्यूनतम आय योजना कार्यक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुआ कहा था, इस पार्टी की पुरानी आदत है। यह चुनाव जीतने के लिए कुछ भी कर सकती है। उपाध्यक्ष का पद सरकारी पद होता है और वैसे भी देश में पिछले 10 मार्च से आचार संहिता लागू है। देश की नीति बनाने वाली इस संस्था के सबसे बड़े अधिकारी का जवाब चुनाव आयोग को आता है, मैंने वह टिप्पणी अर्थशास्त्री के रूप में की थी। कल भारत सरकार का हर अधिकारी भी सत्ता पक्ष या विपक्ष का समर्थन जनमंचों से कर सकता है। भारतीय नागरिक के रूप मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत यह कहते हुए कि उसके बयान को उसके विभाग से न जोड़ा जाये। राज्यपाल कल्याण सिंह ने विगत 23 मार्च को एक सार्वजनिक भाषण में अपने गृह नगर अलीगढ़ में कहा, हम सभी भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता हैं और इस नाते कहेंगे कि पार्टी को जितायें और हम सभी चाहेंगे कि मोदी एक बार फिर से प्रधानमंत्री बनें। महामहिम यह आधारभूत बात भूल गए कि वह जब तक इस पद पर हैं किसी दल के नहीं रह सकते या उसकी वकालत नहीं कर सकते। सार्वजनिक क्षेत्र के एयर इंडिया ने अपने बोर्डिंग पास पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर लगाई। चुनाव आयोग ने इसे भी नोटिस भेजा है। एयर इंडिया के अधिकारियों ने कहा है कि वे इन बोर्डिंग पासों को वापस लेंगे। देश की राजनीति में एक नयी परम्परा उभर रही है जो प्रजातंत्र पर जनता के विश्वास को ठेस पहुंचा सकती है। अधिकारी भक्तिभाव में आ गए हैं। इसका कारण समझना मुश्किल नहीं हैं। यह भक्ति उन्हें अचानक राज्यसभा या लोक सभा और कई मामलों में मंत्री पद या राज्यपाल पद तक पहुंचाने का पासपोर्ट साबित हो रहा है। राज्यपाल को अपने बेटे के लिए टिकट चाहिए तो भक्ति करने में कोई दोष नहीं नजर आता। दरअसल, उपरोक्त कृत्यों पर सबसे पहले इन्हें पद से हटाना चाहिए और फिर सजा की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी पद पर रहते हुए भक्तिभाव में न आये। एक और ताजा उदाहरण देखें। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक जनसभा में बालाकोट स्ट्राइक का जिक्र करते हुए भारतीय सेना को मोदी की सेना कहा। आयोग इसकी भी जांच कर रहा है। इस देश में अभिजात्य वर्ग और खासकर सत्ताधारी दलों को शासन में रहते हुए कानून का डर इसलिए नहीं लगता क्योंकि वे जानते हैं कि हमारे कानून की प्रक्रिया इतनी लम्बी है कि उनका कुछ नहीं होगा और अगर होगा भी तो जब फिर सरकार आयेगी तो सब कुछ रफा-दफा हो जाएगा। जाने माने केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त एन विट्ठल ने अपने कार्यकाल में 94 बड़े अधिकारियों को भ्रष्टाचार के मामलों में लिप्त पाया और उनके नाम वेबसाइट पर डाल दिए लेकिन 19 साल बाद भी इनमें से किसी भी अधिकारी पर कोई मुकदमा नहीं चला। भक्तिभाव न होने के खामियाजे का एक ताजा उदाहरण देखें, उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में प्राइमरी स्कूलों के सात शिक्षकों को निलंबित किया है जिनमें एक प्राइवेट स्कूल का अध्यापक भी है। आरोप है उनमें से कुछ ने पुलवामा और बालाकोट के घटनाओं पर ट्विटर पर या व्हाट्स अप के जरिये शक जाहिर किया था। एक सहायक शिक्षक ने छ: माह बाद रिलीज हुए वेतन को लेकर कहा कोई तीर नहीं मारा है तो सरकार को यह इतना नागवार गुजरा कि इस मास्साब को सस्पेंड कर दिया गया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या देश का प्रजातंत्र 70 साल बाद भी बेहतर हो पाया है।
(लेखक वरिष्ठï पत्रकार हैं)

Loading...
Pin It