कसमें-वादे और लोकतंत्र का उत्सव

१११ प्रेम शर्मा

चुनाव आयोग की घोषणा के साथ ही भारत में कसमें वायदे, जाति, क्षेत्रवाद, परिवारवाद से परिपूर्ण दुनिया के सबसे खर्चीले लोकतंत्र का उत्सव शुरू हो गया है। सीमित संसाधनों के बीच खर्चे और अन्य गतिविधियों पर नजर रखने तथा चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने पर कठोर कार्रवाई के बाद भी सबकुछ होना अपरिहार्य है। पिछले लगभग पांच-छह लोकसभा और इतने ही विधानसभा चुनाव उत्सव को करीब से देखने और समझने के बाद इतना जरूर समझ में आ गया कि भारत में आज भी चुनाव कसमें वायदे, भावनाओं को भुनने के साथ ही क्षेत्रवाद, जातिवाद और परिवार वाद से मुक्त नहीं हो पाया। लगभग हर चुनाव में कोई भी राजनैतिक दल ऐसा नही होगा जो लम्बे-चौड़े वायदे और घोषणा पत्र जारी न करता हो लेकिन उसका कितना फायदा जनता को मिलता है, यह जनता अच्छी तरह जानती है।
देश में दुनिया के सबसे महंगा चुनाव का दौर चल रहा है, यह हमारे चिंतन का एक अनिवार्य विषय है। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज और राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार 29 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों वाले विशाल लोकतंत्र में चुनावों का कुल खर्च इस बार 500 अरब रुपये से आगे जाएगा। वर्ष 2016 में अमेरिका में राष्ट्रपति और कांग्रेस (निचले सदन) के चुनावों में 6.5 अरब डॉलर अर्थात 455 अरब रुपये खर्च हुए थे। अमेरिका का रिकॉर्ड भारत के इस आम चुनाव में टूट जागएगा।
भारत में वर्ष 2014 के चुनावों में 300 अरब रुपये से ज्यादा खर्च हुए थे और अकेले चुनाव आयोग ने 4,000 करोड़ रुपये खर्च किए थे। जाहिर है, सीमित संसाधनों के चलते चुनावों को किफायती बनाने के लिए चुनाव आयोग की कोई विशेष तैयारी नहीं दिख रही है। ऐसे में किसी ठोस पहल की आशा कैसे की जाए। चुनावों की घोषणा से लेकर 23 मई तक भारत के तन-मन-धन का एक बड़ा भाग चुनावों की भेंट चढ़ेगा तो क्या करना चाहिए। ध्यान रहे, लोकतंत्र की जिम्मेदारी केवल चुनाव आयोग या सरकार या राजनीतिक पार्टियों पर ही नहीं है, हम मतदाताओं और नागरिकों का भी कर्तव्य है।
आज हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे विशाल लोकतंत्र में चुनावों पर जो भी खर्च हो, वह देश को सभ्य और सकारात्मक दिशा में ले जाए। चुनावों में मन का महत्व बढ़े, धन का नहीं। स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री और भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार रहे डॉ भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि भारत में जनतंत्र कामयाब नहीं हो सकता क्योंकि यहां की सामाजिक व्यवस्थाएं संसदीय लोकतंत्र के प्रारूप से मेल नहीं खाती। जून, 1953 में उन्होंने बीबीसी को दिए एक बेहद विस्फोटक इंटरव्यू में ये बातें बड़ी साफगोई से कही थीं, भारत की चुनौती-क्या लोकतांत्रिक प्रयोग कामयाब रहेगा? इस खास सिरीज में बीबीसी भारत के नए जन्मे लोकतंत्र की समीक्षा कर रहा है और इसी में आंबेडकर से हुई खास बातचीत भी शामिल है।
आप देश में कहीं भी लोगों से पूछिए कि वे किन बातों से सबसे ज्यादा परेशानी महसूस करते हैं। वे बताएंगे कि वे भ्रष्टाचार से परेशान हैं, अफसरशाही से परेशान हैं, पुलिस और प्रशासन से परेशान हैं। कोई बताता है कि किस तरह उनके इलाके का विकास नहीं हो रहा है। किसी को रोजगार नहीं मिल रहा, किसी को अपनी फसल औने-पौने दामों में दलालों को बेचनी पड़ता है। लेकिन ये मुद्दे हमारे चुनावों में निर्णायक नहीं बनते। बहुत हुआ तो उम्मीदवारों के वोट मांगने आने पर कोई प्रतिनिधिमंडल उनसे इनका जिक्र कर देता है, उम्मीदवार आश्वासन दे देते हैं। लेकिन इसके लिए मतदाता उम्मीदवारों की बांहें नहीं मरोड़ते। यह सभी ने देखा है कि जो नेता महंगी गाडिय़ों में अपने चुनाव क्षेत्रों में जाते हैं, उनकी लोकप्रियता बढ़ जाती है। सैकड़ों गाडिय़ों का काफिला निकालना, हेलिकॉप्टर उतार देना, गाजे-बाजे के साथ नामांकन पत्र भरना ऐसे ही असर-रसूख का प्रदर्शन है। सिर्फ उम्मीदवार ही नहीं, वे राजनैतिक पार्टियां भी ऐसे प्रदर्शन करती हैं, जो अपने घोषणापत्रों में गरीबों के उत्थान या काला धन बाहर निकालने की बातें करती हैं।
तमाम राजनैतिक पार्टियां जाति के ही आधार पर उम्मीदवार खड़े करती हैं। वे जीत भी जाते हैं। ऐसा ही मुद्दा परिवारवाद का है। पूरे देश में इसके खिलाफ तुमुल कोलाहल होता है, लेकिन नेता के बेटे, दामाद, बहू, भतीजी या भाई को मैदान उतारा जाता है और वे चुनाव जीतते हैं। इस तरह के विरोधाभासों से दो तरह के निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। एक तो यह कि देश के मतदाता दो मुंहे हैं। वे कहते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं। लेकिन अब दौर बदला है। जनता कुछ सोचने लगी है। उसे अपने आने वाले भविष्य को लेकर चितिंत देखा जा रहा है। इसलिए हमारा नैतिक दायित्व यह बनता है कि हमारी गाढ़ी कमाई से मनाए जाने वाले इस उत्सव में हम, परिवारवाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और विकास, क्षेत्रवाद, कालाधन जैसे मुद्दों पर गहराई से मंथन करने के बाद ही कोई ठोस निर्णय लें।

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