प्रदूषण पर हाई कोर्ट की हिदायत के मायने

सवाल यह है कि जनहित के मुद्दों पर हर बार कोर्ट को दखल क्यों देना पड़ता है? क्या प्रदूषण के मामले में केंद्र व राज्य सरकारें गंभीर नहीं हैं? केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड क्या कर रहा है? क्या जहरीली होती हवा को साफ करने की जिम्मेदारी सरकार की नहीं है? क्या कोर्ट के आदेश के बिना प्रदूषण नियंत्रण के लिए जरूरी कदम उठाने की आवश्यकता जिम्मेदारों को समझ नहीं आती है?

Sanjay Sharma

्रदेश में बेकाबू होते प्रदूषण पर हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस मामले में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व केंद्र सरकार से जवाब-तलब किया है। साथ ही यह साफ कर दिया है कि केवल सेमिनारों और गोष्ठिïयों से प्रदूषण के स्तर को कम नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए जरूरी कदम उठाने की जरूरत पर बल दिया है। सवाल यह है कि जनहित के मुद्दों पर हर बार कोर्ट को दखल क्यों देना पड़ता है? क्या प्रदूषण के मामले में केंद्र व राज्य सरकारें गंभीर नहीं हैं? केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड क्या कर रहा है? क्या जहरीली होती हवा को साफ करने की जिम्मेदारी सरकार की नहीं है? क्या कोर्ट के आदेश के बिना प्रदूषण नियंत्रण के लिए जरूरी कदम उठाने की आवश्यकता जिम्मेदारों को समझ नहीं आती है? क्या लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने की छूट दी जा सकती है? क्या स्वच्छ हवा में सांस लेना नागरिकों का हक नहीं है?
यूपी के अधिकांश शहर प्रदूषण की चपेट में हैं। ग्रीनपीस साउथ-ईस्ट एशिया की वल्र्ड एयर क्वॉलिटी की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश की राजधानी लखनऊ दुनिया का नौवां सबसे प्रदूषित शहर है। इस सूची के टॉप-21 शहरों में सबसे अधिक यूपी के सात शहर शामिल हैं। इनमें गाजियाबाद दूसरे, नोएडा छठे, वाराणसी 14वें, मुरादाबाद 15वें, आगरा 16वें, कानपुर 21वें स्थान पर है। प्रदूषण के लिए कई कारक जिम्मेदार हैं। राजधानी समेत प्रदेश के तमाम शहरों में लाखों की संख्या में वाहन रोजाना सडक़ों पर दौड़ रहे हैं। इन वाहनों से निकलने वाला धुआं वातावरण को प्रदूषित कर रहा है। इनमें भी खटारा वाहन सबसे अधिक प्रदूषण फैला रहे हैं। आज तक इन वाहनों को चलन से बाहर नहीं किया गया। वहीं निर्माण कार्य के दौरान सडक़ों पर मिट्टी-बालू रख दी जाती है। ये धूल कण हवा के साथ प्रदूषण को बढ़ा देते हैं। अनियोजित विकास के चलते शहरों में पेड़ों की कटान से भी स्थितियां बदतर हुई हैं। ये पेड़ प्रदूषण को रोकने का काम करते हैं। कारखानों से निकलने वाले केमिकल नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं जबकि इसका धुआं वातावरण को जहरीला बना रहा है। यह सब तब हो रहा है जब सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का गठन किया है। बावजूद बोर्ड प्रदूषण नियंत्रण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा है। सरकारें भी प्रदूषण के नाम पर कभी-कभी सेमिनार और गोष्ठिïयां आयोजित कर कर्तव्यों की इतिश्री कर रही हैं। सरकार को चाहिए कि वह कोर्ट के आदेशों का पालन कराना सुनिश्चित करे और प्रदूषण नियंत्रण के लिए ठोस और प्रभावकारी कदम उठाए।

 

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