स्वच्छता अभियान तंत्र और सवाल

सवाल यह है कि नगर निगम के दावे फुस्स कैसे हो गए? सफाई के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये आखिर कहां खर्च हो रहे हैं? कर्मचारियों का भारी-भरकम अमला भी शहर की सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने में नाकाम क्यों साबित हो गया? शहर की बदतर हालत के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या लापरवाही और भ्रष्टïाचार के कारण स्थितियों में सुधार नहीं हो रहा है?

Sanjay Sharma

प्रदेश की राजधानी लखनऊ में चले स्वच्छता अभियान और इसके दावों की पोल खुल गई है। स्वच्छ सर्वेक्षण में लखनऊ को 121वीं रैंक मिली है। हालांकि इसके पहले नगर निगम शहर को नंबर वन बनाने का दावा जोर-शोर से कर रहा था। सवाल यह है कि नगर निगम के दावे फुस्स कैसे हो गए? सफाई के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये आखिर कहां खर्च हो रहे हैं? कर्मचारियों का भारी-भरकम अमला भी शहर की सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने में नाकाम क्यों साबित हो गया? शहर की बदतर हालत के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या लापरवाही और भ्रष्टïाचार के कारण स्थितियों में सुधार नहीं हो रहा है? क्या ऐसे ही शहर को स्मार्ट बनाने का सपना सरकार देख रही है?
स्वच्छता अभियान के तहत राजधानी को चमकाने का दावा किया जा रहा है। शहर की सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने की जिम्मेदारी नगर निगम को सौंपी गई है। यहां साफ-सफाई के लिए करीब नौ हजार कर्मचारी है। इसके अलावा निरीक्षण करने के लिए अधिकारियों का भारी-भरकम अमला है। बावजूद स्थिति में सुधार होता नहीं दिख रहा है। पॉश इलाकों को छोडक़र शायद ही सफाई कर्मचारी दूसरे स्थानों पर जाते हैं। यही नहीं कूड़ा निस्तारण के नाम पर सडक़ों पर खुलेआम कूड़ा जला दिया जाता है। गलियों और बाजारों में कूड़े के ढेर लगे रहते हैं। निस्तारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण प्लांट पर कूड़े का पहाड़ लग चुका है। कूड़े की ढुलाई से लेकर सफाई कर्मियों की नियुक्ति और उनके भुगतान तक में खेल चल रहा है। निरीक्षण के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है। रही सही कसर यहां संचालित अवैध डेयरियां पूरी कर देती हैं। यहां से निकला कचरा नालों और नालियों को चोक कर देता है और सडक़ों पर गंदा पानी बहता रहता है। कोर्ट के आदेश के बावजूद इन डेयरियों को आज तक रिहायशी इलाकों से बाहर स्थानांतरित नहीं किया जा सका है। कई स्थानों पर कूड़ेदान पूरी तरह भर चुके हैं लेकिन उनको खाली नहीं किया गया है। लिहाजा लोग कूड़ेदान के पास ही कूड़ा फेंक देते हैं। वहीं बाजार में कूड़ा फैलाने वालों दुकानदारों के खिलाफ भी कभी कोई कार्रवाई नहीं की जाती है। जब राजधानी का यह हाल है तो प्रदेश के दूसरे शहरों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में स्वच्छता अभियान परवान कैसे चढ़ेगा? यदि सरकार वाकई शहर को चमकाना चाहती है तो उसे लापरवाह कर्मचारियों पर शिकंजा कसना होगा साथ ही अधिकारियों की भी जवाबदेही तय करनी होगी। साथ ही विभाग में व्याप्त भ्रष्टïाचार को भी समाप्त करना होगा अन्यथा स्मार्ट सिटी और स्वच्छ शहर का सपना कभी पूरा नहीं होगा।

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