अपना अस्तित्व बचाने के लिए बेटियों को सम्मान दें

समाज में महिलाओं को सम्मान दिलाने के लिए सबसे पहले महिलाओं को आगे आना है। अपने बीच छिपी उन महिलाओं को बेनकाब करना होगा जो पड़ोसी के घर होने वाले विवाद पर तो लंबा चौड़ा भाषण देती हैं, लेकिन अपने घर के मामलों में चुप्पी साधे बैठी रहती हैं।

Sanjay Sharma

किसी भी व्यक्ति की प्रथम पाठशाला उसका परिवार होता है। महिला को परिवार की रीढ़ माना जाता है। इन सबसे बावजूद समाज में महिलाओं को उतना सम्मान नहीं मिलता जितने की वे हकदार होती हैं। पुरुष प्रधान समाज में आज भी महिलाओं को उपभोग की वस्तु माना जाता है। महिलाओं के खिलाफ अत्याचार की घटनाओं में लगातार इजाफा हो रहा है। दहेज प्रथा, महिला उत्पीडऩ, घरेलू हिंसा समेत अनेकों कानून बने लेकिन उनका समाज पर कोई खास असर होता नहीं दिख रहा है। समाज में आज भी दहेज हत्या की घटनाएं हो रही हैं। जिस बच्ची को मां-बाप लाड-प्यार से पालकर बड़ा करते हैं, पढ़ा लिखाकर अपने हक की लड़ाई लडऩा सिखाते हैं, वह लडक़ी शादी के कुछ दिन बाद ही दहेज लोभियों का शिकार हो जाती हैं, क्योंकि उस लडक़ी को प्रताडि़त करने वालों में कहीं न कहीं उस परिवार की महिला भी शामिल होती है, जिस घर में उसका विवाह हुआ है। ऐसे में महिला उत्पीडऩ और दहेज हत्या के लिए पुरुष प्रधान समाज तो जिम्मेदार है ही लेकिन दहेज लोभी और खुद को श्रेष्ठ समझने वाली महिलाओं की भूमिका भी कम नहीं हैं। इसलिए समाज में महिलाओं को सम्मान दिलाने के लिए सबसे पहले महिलाओं को आगे आना है। अपने बीच छिपी उन महिलाओं को बेनकाब करना होगा जो पड़ोसी के घर होने वाले विवाद पर तो लंबा चौड़ा भाषण देती हैं, लेकिन अपने घर के मामलों में चुप्पी साधे बैठी रहती हैं।
ध्यान दें, हम इक्कीसवीं सदी में हैं। आज की लड़कियां लडक़ों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। बीसवीं सदी में इंदिरागांधी, सरोजिनी नायडू, बच्छेंद्रीपाल और किरन बेदी समेत कुछ जाने माने नाम ही लोग जानते थे। लेकिन आज इक्कीसवीं सदी के दौर में लड़कियां और महिलाएं विश्व कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। प्रतिभा पाटिल, कल्पना चावला, कर्णम मल्लेश्वरी, मैरी कॉम, रीता फोगाट, बबिता फोगाट, साक्षी मलिक, पीबी सिन्धु, अपर्णा समेत अनगिनत नाम हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा और साहस के बल पर अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित कर दिया है। इन्हें आधुनिक युग की लड़कियां अपना आदर्श मानती हैं। लेकिन कुछ को उनका परिवार आगे बढऩे नहीं देता तो कुछ को समाज आगे बढऩे से रोकता है। तब भी महिलाएं पुरुषों से आगे हैं। पुरुष महिलाओं के साथ प्रतिस्पर्धा करने लगे हैं। जबकि इतना सब कुछ होने के बाद भी हमारी हर खुशी और सेहत का ध्यान मां, बहू, बहन या बेटी ही रखती है। उसके लिए मां-बाप ही सबकुछ होते हैं। इसलिए आंखें खोलें और बेटियों को ईश्वर का वरदान समझें। उन्हें सम्मान दें, तभी हमारा और आपका अस्तित्व बच पायेगा।

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