हिंद-प्रशांत की उभरती अवधारणा

 राजीव रंजन चतुर्वेदी

विदेश नीति एवं रक्षा समुदायों तथा टिप्पणीकारों के बीच चर्चा हेतु हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) की अवधारणा एक अपरिहार्य विषय बन गयी है। अलबत्ता, उनमें से हरेक व्यक्ति इस विचार से जूझते हुए इस पर गौर कर रहा है कि किस तरह यह परिवर्तित विवेचना उस विशाल सामुद्रिक फैलाव को प्रभावित करेगी, जो अभी एक लगातार बदलती स्थिति में है। इस अवधारणा की प्रकृति एवं व्यापकता को लेकर विविध दृष्टि है, जिससे इस क्षेत्र के कई देशों में इस विकसित होते भू-राजनीतिक मॉडल को लेकर दिलचस्पी का अभाव भी दिखता है।
आसियान अध्ययन केंद्र के एक सर्वेक्षण के द्वारा ‘दक्षिणपूर्व एशिया की स्थिति-2019’ पर दक्षिणपूर्व एशियाई लोगों के विचार लिये गये। इसके प्रश्नों में एक था कि आप हिंद-प्रशांत की अवधारणा को किस रूप में देखते हैं? कुल 61.3 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बताया कि उनकी दृष्टि में यह अवधारणा अस्पष्ट है तथा इसे और भी साफ किये जाने की जरूरत है। इस सर्वेक्षण से यह भी पता चला कि बहुतों के मन में इस अवधारणा के प्रच्छन्न उद्देश्य को लेकर शंकाएं भी हैं, क्योंकि लगभग एक-चौथाई (25.4 प्रतिशत) उत्तरदाताओं ने यह कहा कि इसका उद्देश्य चीन को नियंत्रित करना है, जबकि 17.3 प्रतिशत उत्तरदाताओं के विचार से ‘हिंद-प्रशांत का यह विचार क्षेत्रीय सुव्यवस्था में आसियान की प्रासंगकिता एवं स्थिति कमजोर करने’ की कोशिश कर रहा है।
एक लंबे वक्त से जिस एक मॉडल का सबसे ज्यादा उपयोग हो रहा था, वह एशिया-प्रशांत रहा है। जिसके अंतर्गत उत्तर-पूर्व एशिया से लेकर दक्षिण एशिया के अलावा प्रशांत महासागर, दक्षिण चीन सागर तथा हिंद महासागर जैसे बड़े सामुद्रिक विस्तार के देश शामिल थे। यह नया विचार हिंद महासागर तथा प्रशांत महासागर में अवसरों तथा चुनौतियों की एकरूपता भी दिखाता है। सतत आर्थिक विकास, अपेक्षाकृत राजनीतिक स्थिरता एवं सामाजिक एकता ने एशिया की प्रमुख शक्तियों को इस हेतु समर्थ बनाया है कि वे एजेंडा तय करने तथा वैश्विक नियमन में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करें। इन बदलती वैश्विक आर्थिक तथा रणनीतिक वास्तविकताओं के बीच एशिया एक धुरी के रूप में उभरा है।
हिंद-प्रशांत की इस विकसित होती सोच का नतीजा विविध विचारों एवं दृष्टियों के रूप में सामने आया है। जापान, भारत, इंडोनेशिया और अन्य आसियान देश क्षेत्रीय आर्थिक राजनय, नियम आधारित सुव्यवस्था और साझी रुचियों को लेकर सहयोग पर बल देते हुए अधिक सक्रिय दिखते हैं। वहीं, अमेरिकी और ऑस्ट्रेलियाई नजरिया भी, जो पहले चीन विरोधी लगता था, अब विकसित हो रहा है।
अमेरिका के हिंद-प्रशांत कमांड के कमांडर एडमिरल फिलिप एस डेविडसन ने नयी दिल्ली में आयोजित एक पैनल चर्चा में रेखांकित किया कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र का उद्देश्य समुदायों का निर्माण करना है, न कि विरोधों का। इसके उद्देश्य के रूप में चीन के नियंत्रण की बात पर उन्होंने यह भी कहा कि हिंद-प्रशांत नीति किसी के नियंत्रण की नीति नहीं है। एक अन्य मौके पर उन्होंने यह दोहराया कि ‘हिंद-प्रशांत एक ऐसा इंजन है, जो वैश्विक आर्थिक विकास को गति प्रदान करता है।’
इसके साथ ही उन्होंने ‘एक स्वतंत्र तथा खुले हिंद-प्रशांत’ की विस्तृत व्याख्या करते हुए उसके पांच मुख्य घटकों का उल्लेख भी किया, जो इस प्रकार हैं। पहला, ‘दूसरे राष्ट्रों द्वारा बलपूर्वक बाध्य किये जाने से मुक्त’ होने के साथ ही ‘मूल्यों तथा आस्था प्रणाली’ के लिहाज से भी स्वतंत्र’; दूसरा, धार्मिक आजादी एवं सुशासन समेत ‘व्यक्तिगत अधिकार एवं आजादियां’; तीसरा, ‘संयुक्त राष्ट्र चार्टर तथा ‘मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के साझे मूल्य’; चौथा, ‘जिन सागरों एवं हवाई मार्गों पर हमारे राष्ट्र एवं अर्थव्यवस्थाएं आश्रित हैं, उन तक बंधनमुक्त पहुंच’; एवं पांचवां, ‘खुला निवेश वातावरण, राष्ट्रों के बीच पारदर्शी समझौता, बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा, निष्पक्ष एवं पारस्परिक व्यापार’।
हिंद-प्रशांत की इस अवधारणा पर भिन्न-भिन्न दृष्टि होते हुए भी उसके मुख्य संगठनात्मक सिद्धांतों पर सबकी सहमति दिखती है, जो बड़ी शक्तियों के साथ ही इस विशाल सामुद्रिक क्षेत्र के चारों ओर बसे देशों के आर्थिक तथा सुरक्षा संबंधी रिश्तों को गुंफित करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंद-प्रशांत को लेकर भारत के विजन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए इसे एक ‘नैसर्गिक क्षेत्र’ तथा असीमित वैश्विक अवसरों एवं चुनौतियों का स्थल बताया है।
उन्होंने हिंद-प्रशांत के प्रति भारत की दृष्टि को भौगोलिक तथा सभ्यतामूलक दोनों बोध में एक स्वतंत्र, खुला एवं समावेशी क्लब के रूप में प्रस्तावित किया है, जो सबकी समृद्धि के लिए खुला हो। ‘सबके लिए सुरक्षा तथा विकास’ की शब्दावली में मोदी का यह विजन भली-भांति समाहित हो जाता है।

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