प्रदूषण नियंत्रण पर सरकार की कसरत और सवाल

सवाल यह है कि क्या केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इस जिम्मेदारी को सफलतापूर्वक निभा सकेगा? क्या करोड़ों खर्च करने की मंजूरी दे देने भर से प्रदूषण का स्तर कम हो जाएगा? क्या शहरों में लगने वाले जाम, सड़कों पर दौड़ रही पुरानी गाडिय़ां और पलारी जलाने को रोके बिना प्रदूषण स्तर को कम करने की कल्पना की जा सकती है? क्या खुले में जलाये जा रहे कूड़े और फैक्ट्रियों से निकल रहे जहरीले धुएं को बंद करने के लिए बेहतर विकल्प तलाशे गए हैं?

Sanjay Sharma

देश में बढ़ते प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए सरकार ने कसरत शुरू कर दी है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने देश के 102 शहरों में प्रदूषण की रोकथाम के लिए राष्टï्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम शुरू किया है। इनमें लखनऊ समेत यूपी के 15 सबसे अधिक प्रदूषित शहर भी शामिल हैं। इस कार्यक्रम को जमीन पर उतारने के लिए दो वर्षों में तीन सौ करोड़ खर्च किया जाएगा। सरकार को उम्मीद है कि इससे प्रदूषण स्तर में बीस से तीस फीसदी की कमी आएगी। सरकार का यह कदम सराहनीय है बावजूद इसके कुछ सवाल बेहद गंभीर हैं और इनका निदान किए बिना कोई भी कसरत प्रदूषण को नियंत्रित करने में कारगर साबित नहीं होगी। अहम सवाल यह है कि क्या केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इस जिम्मेदारी को सफलतापूर्वक निभा सकेगा? क्या करोड़ों खर्च करने की मंजूरी दे देने भर से प्रदूषण का स्तर कम हो जाएगा? क्या शहरों में लगने वाले जाम, सड़कों पर दौड़ रही पुरानी गाडिय़ां और पलारी जलाने को रोके बिना प्रदूषण स्तर को कम करने की कल्पना की जा सकती है? क्या खुले में जलाये जा रहे कूड़े और फैक्ट्रियों से निकल रहे जहरीले धुएं को बंद करने के लिए बेहतर विकल्प तलाशे गए हैं? क्या आम आदमी को जागरूक किए बिना इस बड़े संकल्प को पूरा किया जा सकेगा? क्या सरकार ने इन सबके लिए कोई पुख्ता रणनीति तैयार की है?
दिल्ली समेत देश के अधिकांश शहर प्रदूषण की चपेट में हैं। इस पर नियंत्रण लगाने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का गठन किया गया था लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। जहां तक यूपी का सवाल है तो यहां के 15 शहर बेहद प्रदूषित हो चुके हैं। प्रदूषण की असली वजह बेतरतीब विकास है। शहरों में चिकित्सा सेवाएं, शिक्षा और रोजगार की उपलब्धता आदि ने संतुलन को बिगाड़ दिया है। लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर गए, कर रहे हैं। लिहाजा रियल एस्टेट का कारोबार बढ़ा। जंगलों को काटकर इमारतें खड़ी कर दी गईं। इस विकास में पर्यावरण को संतुलित करने वाले जंगलों को नजरअंदाज कर दिया गया। रही सही कसर सड़कों पर रोजाना दौड़ती लाखों गाडिय़ों ने निकाल दी। ये गाडिय़ां शहर की हवा में जहर घोलती चली गईं और जिम्मेदार हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। तमाम फैक्टियां स्थापित हुईं और इनकी संख्या तेजी से बढ़ी। यदि सरकार प्रदूषण पर नियंत्रण लगाना चाहती है तो उसे इस कार्यक्रम को अंजाम तक पहुंचाना होगा। इसके लिए उसे न केवल प्रदूषण के तमाम कारकों को खत्म करना होगा बल्कि इसका विकल्प भी लोगों के सामने पेश करना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो गंगा सफाई की तरह राष्टï्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम की भी हवा निकल जाएगी।

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