कभी नहीं टूटा लोक गायन से रिश्ता

अपने सरोकारों और सिस्टम की नब्ज को लेकर भी वे बेहद संवेदनशील थे । उन्नीस सौ पंचानवे में आया एलबम क्राई फॉर क्राई इसका शानदार उदाहरण है । इस एलबम में आम आदमी की आवाज गजलों के जरिए निकल कर सीधे रूह में उतर जाती थी। एक किसान और गरीब के दिल का दर्द उनके स्वर में और घना हो जाता था । मिट्टी की खुशबू जगजीत की सांसों में हरदम बसी रही । गंगानगर की जिस जमीन पर उन्होंने लोक गायन से रिश्ता जोड़ा, वह सारी उमर चला । अपनी बंगाली पत्नी चित्रा को भी उन्होंने पंजाबी लोक संगीत से सराबोर कर दिया ।

राजेश बादल

पने सरोकारों और सिस्टम की नब्ज को लेकर भी वे बेहद संवेदनशील थे । उन्नीस सौ पंचानवे में आया एलबम क्राई फॉर क्राई इसका शानदार उदाहरण है । इस एलबम में आम आदमी की आवाज गजलों के जरिए निकल कर सीधे रूह में उतर जाती थी। एक किसान और गरीब के दिल का दर्द उनके स्वर में और घना हो जाता था। मिट्टी की खुशबू जगजीत की सांसों में हरदम बसी रही। गंगानगर की जिस जमीन पर उन्होंने लोक गायन से रिश्ता जोड़ा, वह सारी उमर चला। अपनी बंगाली पत्नी चित्रा को भी उन्होंने पंजाबी लोक संगीत से सराबोर कर दिया । सुनने और देखने वाले समझ ही नहीं पाते कि चित्रा की जुबान पंजाबी नहीं है।
पंजाबी टप्पे इसका उम्दा नमूना हैं। सुनने वाले तो उस समय हैरान रह जाते जब वे पंजाबी लोक गीत गाते तो दर्शक वहीं थिरकने लगते। अक्सर ऐसा होता कि जगजीत भी जाकर उनके साथ शामिल हो जाते। हालांकि एक लोकगीत तो ऐसा था, जो सुनने वालों को रुला देता था। यह गीत एक ऐसी लड़की के बारे में है, जो मां नहीं बन पा रही है । इसके बोल हैं- मिट्टी दा बाबा नइयो बोलदा। जगजीत अपने बचपन में पुराने फिल्मी गीत गाया करते थे । कुंदनलाल सहगल, सीएच आत्मा, मोहम्मद रफी मुकेश, हेमंत, महेंद्र कपूर से लेकर लता मंगेशकर तक के अनेक गीत उन्हें याद थे । इन महान गायकों के गीत गाकर उन्हें श्रद्धांजलि देने का उनका अपना तरीका अदभुत था। उनके गीत नकल नहीं होते थे बल्कि उन गीतों या नज्मों में जगजीत की अपनी खुशबू होती थी।
इसी तरह जगजीत ने हर भाषा को सम्मान दिया । बीस से ज्यादा भाषाओं में उन्होंने गीत गाए। इनमें बोलियां भी शामिल हैं। सैर सपाटे के शौकीन जगजीत ने संसार का शायद ही कोई देश छोड़ा हो। हर देश में उनके चाहने वाले उन्हें पलकों पर बिठाते थे । विदेशों में जगजीत की लोकप्रियता से किसी को भी ईष्र्या हो सकती थी । साथियों के लिए जगजीत रिश्ते से कम नहीं थे । जितने अच्छे गायक, उससे अच्छे संगीतकार और सबसे अच्छे इंसान । हर किसी का दर्द हर किसी की समस्या उनकी अपनी बन जाती थी। कई बार लोग इस आदत का बेजा फायदा उठाते। जगजीत सब कुछ जानते हुए भी बस मुस्कुराते रहते । जगजीत के एक साजिंदे पीटरसन तो उन्हें याद करते-करते फूट-फूट कर रोने लगते हैं। पीटरसन को एक घर खरीद कर जगजीत ने उपहार में दिया था। क्या आज के जमाने में कोई गायक ऐसा बड़ा दिल दिखाता है, जब जगजीत देशभक्ति के रंग में रंगते तो उनका एक नया रूप सामने होता। उन्नीस सौ सत्तानवे में एक नायाब नगीना जगजीत ने देशवासियों को सौंपा था । यह था-सारे जहां से अच्छा । इसकी रचनाएं और गायिकी आपको राष्ट्रीयता के लोक में ले जाती हैं। इस कड़ी की अंतिम बात। जगजीत का एक शौक ऐसा था, जिसके बारे में कम लोग ही जानते हैं । यह था घोड़ों से प्यार । मुंबई और पुणे के पास उनके अपने घोड़े थे, जिन्हें वे बेहद प्यार करते थे।
जगजीत ने कभी गंगानगर और जालंधर में रुपहले परदे का सपना देखा था। इसके लिए वे घर से बिना बताएं मुम्बई भागे थे । अडिय़ल घोड़े की तरह मुम्बई ने इस सवार को परखा, दुलत्ती लगाईं और पीठ से गिरा दिया। जगजीत भी जिद्दी। दुबारा अडिय़ल घोड़े पर सवार । इस बार मुम्बई ने सवार को सलाम किया और शौहरत के उस शिखर पर पहुंचाया जो गंगानगर में देखे सपने से कई गुना विराट और ऊंचा था। लेकिन यश के शिखर तक पहुंचने के लिए जगजीत का एक पड़ाव परदे की दुनिया में भी था । इस पारी का आगाज हुआ 1969 में। गुजराती फिल्म बहुरूपी से। इसमें उन्होंने संगीत दिया था और गीत भी गाए थे। अगले साल याने 1970 में एक गुजराती फिल्म और मिली। धरती न छोड़ू । इसमें भी जगजीत और सुमन कल्याणपुर ने युगल गीत गाया था । इसके बाद थोड़ा अंतराल हो गया। मगर एक ऐसा दुर्लभ संयोग बना कि देश के लोग चौंक उठे। आपको याद होगा हिंदुस्तान की पहली बोलती फिल्म थी-आलमआरा । दुर्भाग्य से इस फिल्म के प्रिंट जल गए थे । हां कुछ फोटोग्राफ जरूर बच गए थे । नष्ट हो चुका ये दस्तावेज जब डाक्यूड्रामा की शक्ल में एक बार फिर दर्शकों तक पहुंचा तो उसमें जगजीत की भूमिका कोई कम नहीं थी। इस ऐतिहासिक दस्तावेज में अपनी आवाज और संगीत के जरिए जगजीत ने लोगों का दिल जीत लिया । इसके बाद फिल्म आई। आविष्कार । उन्नीस सौ तिहत्तर का साल था। जगजीत और चित्रा ने वाजिद अली शाह की रचना बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए गाया । सबसे अलग और सबसे अनूठा। एक बात आपको शायद पता न हो कि बासु भट्टाचार्य ने जगजीत और चित्रा को जब रिकॉर्डिंग होनी थी तो स्टूडियो में ही रात को रुकने का निर्देश दिया था। फिर रात तीन बजे जगाया और रिकॉर्ड किया इसलिए कि आवाज भारी हो । एकदम पक्का और शास्त्रीय । संभव है आपने इसे न सुना हो। इसके बाद एक फिल्म आई 1975 के आसपास । किस्सा कुर्सी का ।
क्रमश:

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