सोशल मीडिया, आतंकवाद और सेना प्रमुख की चिंता

सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया पर लगाम लगाई जा सकती है? क्या सरकार इसे नियंत्रित करने के लिए ठोस पहल करेगी? क्या सोशल मीडिया के दुरुपयोग से इंकार किया जा सकता है? क्या आतंकवादियों को इसके प्रयोग से रोका जा सकता है? क्या जागरूकता के बिना कट्टरपंथी सोच के प्रभाव में आने से बचा जा सकता है? क्या सोशल मीडिया को नियंत्रित कर सेना के जवानों को हनी ट्रैप से बचाया जा सकता है?

Sanjay Sharma

रायसीना डायलॉग में सेना प्रमुख बिपिन रावत ने सोशल मीडिया पर विशेष नियंत्रण लगाने की वकालत की। उन्होंने स्वीकार किया कि इसके जरिए कट्टरपंथ व आतंकवाद को बढ़ावा मिल रहा है और यह आतंकवादियों के वित्तीय संसाधन बढ़ाने का जरिया बन चुका है। सेना प्रमुख की चिंता बेहद गंभीर है। सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया पर लगाम लगाई जा सकती है? क्या सरकार इसे नियंत्रित करने के लिए ठोस पहल करेगी? क्या सोशल मीडिया के दुरुपयोग से इंकार किया जा सकता है? क्या आतंकवादियों को इसके प्रयोग से रोका जा सकता है? क्या जागरूकता के बिना कट्टरपंथी सोच के प्रभाव में आने से बचा जा सकता है? क्या सोशल मीडिया को नियंत्रित कर सेना के जवानों को हनी ट्रैप से बचाया जा सकता है?
सोशल मीडिया सूचना क्रांति का सबसे शक्तिशाली परिणाम है। इसका दायरा बढ़ता जा रहा है। इसकी पैठ समाज के हर तबके तक है। फेसबुक, व्हाट्स एप और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के प्लेटफार्म अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन चुके हैं। यहां कोई भी अपनी बात और भावनाओं को बिना संपादित किए कह सकता है। इसके जरिए विशेष विचारधाराओं का प्रचार-प्रसार भी धड़ल्ले से किया जा रहा है। यह सकारात्मक और नकारात्मक दोनों होती हैं। स्मार्ट फोन के प्रचलन ने इसके दायरे को और बढ़ा दिया है। अब बिना मिले ही किसी को अपनी विचारधारा से प्रभावित किया या दूसरे की विचारधारा से प्रभावित हुआ जा सकता है। लिहाजा सोशल मीडिया का दुरुपयोग भी हो रहा है। सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाकर हिंसा भडक़ाने की कई घटनाएं सामने आ चुकी है। कई निर्दोष लोग सोशल मीडिया के जरिए फैली फेक न्यूज के कारण अपनी जान गंवा चुके हैं। भीड़ की हिंसा इसका उदाहरण है। आतंकवादी संगठनों के लिए यह एक प्रभावशाली औजार है। इसके जरिए वे दुनिया के किसी कोने के युवाओं को प्रभावित कर आतंकी बना रहे हैं। कश्मीर में आतंकियों को भुठभेड़ से बचाने के लिए सोशल मीडिया के जरिए पत्थरबाजों को भेजे जाने की सूचना मिलती रहती है। वहीं इसके जरिए सेना के जवानों को हनी ट्रैप में फंसाकर गोपनीय जानकारी हासिल की जा रही है। बावजूद इसके सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता क्योंकि यह अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट होगी। सरकार को चाहिए कि वह ऐसी रणनीति बनाएं जिसके जरिए कट्टरपंथ और आतंकवाद को बढ़ावा देने वालों पर नजर रखी जा सके और अफवाहों को फैलने से रोका जा सके। साथ ही सरकार को सतत जागरूकता अभियान चलाना चाहिए ताकि लोग खुद नकारात्मक संदेशों से दूर रहें।

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