दखल पसंद नहीं करते थे जगजीत

अबू तालिब की एक ऐसी ही रचना है-कभी आंसू, कभी खुशी बेची, हम गरीबों ने बेबसी बेची। एक हम थे कि बिक गए खुद ही, वर्ना दुनिया ने दोस्ती बेची। एक बेहद खूबसूरत रचना नवाब देवबंदी की थी। वह थी वो रुलाकर हंस न पाया देर तक, जब मैं रोकर मुस्कुराया देर तक। उन्नीस सौ छियानवे में आए- यूनीक और मिराज। इनकी गजलों ने एक बार फिर धूम मचाई। निदा फाजली की एक रचना तो जैसे जगजीत के लिए ही बनी थी। अपनी मर्जी से कहां अपने सफर के हम हैं, रुख हवाओं का जिधर है , उधर के हम हैं।

राजेश बादल

बू तालिब की एक रचना भी कुछ इसी तरह के सरोकार के साथ थी। कभी आंसू, कभी खुशी बेची, हम गरीबों ने बेबसी बेची। एक हम थे कि बिक गए खुद ही, वर्ना दुनिया ने दोस्ती बेची। एक बेहद खूबसूरत रचना नवाब देवबंदी की थी। वह थी-वो रुलाकर हंस न पाया देर तक, जब मैं रोकर मुस्कुराया देर तक। उन्नीस सौ छियानवे में आए-यूनीक और मिराज। इनकी गजलों ने एक बार फि धूम मचाई। निदा फाजली की एक रचना तो जैसे जगजीत के लिए ही बनी थी। अपनी मर्जी से कहां अपने सफर के हम हैं, रुख हवाओं का जिधर है, उधर के हम हैं।
मिराज में कैफ भोपाली की गजल-तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है हम लोग गुनगुनाते हैं। उन्नीस सौ सत्तानवे में आया लव इज ब्लाइंड। उन्नीस सौ अट्ठानवेे में सिलसिले। उन्नीस सौ निन्यानवे में मरासिम, दिल कहीं होश कहीं और नई दिशा। नई सदी याने 2000-2001 में आए- अ जर्नी ए सहर और आइना। इन संग्रहों में एक बशीर बद्र की गजल-मुझसे बिछड़ के खुश रहते हो, मेरी तरह तुम भी झूठे हो। तुम तनहा दुनिया से लड़ोगे, बच्चों सी बातें करते हो। काफी पसंद की गई थी। इसके अलावा डिफरेंट स्ट्रोक्स,सोज और लाइफ स्टोरी भी सराहे गए। दो हजर दो में-फॉरगेट मी नॉट और संवेदना। संवेदना प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं का एलबम है । दो हजार तीन में- क्लोज टू माय हार्ट और शिवा। दो हजार चार में-मुंतजिर, दो हजार पांच में – बेस्ट ऑफ जगजीत एंड चित्रा और तुम तो नहीं हो। दो हजार छह में- कोई बात चले। दो हजार नौ में इंतेहा। कम लोग ही यह जानते हैं कि जगजीत अपनी गजलों और गजलकार का चुनाव खुद करते थे। उसमें किसी का दखल पसन्द नहीं करते थे। इंतेहा में उन्होंने गजल के सशक्त हस्ताक्षर आलोक श्रीवास्तव की एक गजल को आवाज देकर अमर बना दिया। आलोक की गजल जगजीत की गाई आखिरी सुपरहिट गजल है। यह गजल है-मंजिलें क्या हैं, रास्ता क्या है। हौसला हो तो फासला क्या है। इसके बाद आखिरी संग्रह दो हजार बारह में आए-तेरा बयान गालिब और द मास्टर एंड हिज मैजिक। दरअसल हिंदुस्तान की आम अवाम की गजल का सफर जगजीत से शुरू हुआ और जगजीत ने उसे मंजिल तक पहुंचा कर दम लिया। इस गजल यत्रा के अनेक पड़ाव हैं। हर पड़ाव पर जगजीत ने अपनी कीर्ति पताका फहराई है । दरअसल गुलजार के छोटे भाई त्रिलोचन सिंह जगजीत के दोस्त थे। वो ऑल इंडिया रेडियो में काम करते थे। इस वजह से जगजीत भी गुलजार को बड़े भाई जैसा मान देते थे। जब संघर्ष के दौर से गुजर रहे थे तो उन्ही के साथ सुख दु:ख बांटते थे। अपने जमाने के मशहूर गजल गायक मेंहदी हसन की गाई और फैज अहमद फैज की लिखी गजल उन दिनों जगजीत बहुत गाया करते थे । यह गजल थी-गुलोंं में रंग भरे वादे नौबहार चले, चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले। एक दिन गुलजार ने इसे सुना । गुलजार ने जगजीत के अंदाज में हिंदुस्तान की गजल का एक नया रूप देखा। इन्हीं दिनों उन्हें दूरदर्शन के लिए मिर्जा गालिब पर एक धारावाहिक का प्रस्ताव मिला। उसके संगीत और गायन के लिए उन्होंने जगजीत से बात की। जगजीत को प्रस्ताव में नयापन तो लगा लेकिन गुलजार के आग्रह ने जगजीत को उलझन में भी डाल दिया। दरअसल गुलजार इसमें मिर्जा गालिब के जमाने के साज और संगीत की शैली इस्तेमाल करना चाहते थे। उन्होंने शर्त रखी कि जगजीत आज के वाद्य वृंद से बचें और ध्यान रखें कि मिर्जा गालिब संगीत के जानकार और गायक नहीं थे। वो सिर्फ शब्द सितारे थे। हां, यह जरूर था कि वो तरन्नुम में गाते थे। शर्त बेहद कठिन थी, लेकिन जगजीत ने स्वीकार कर ली। याद दिलाने की जरूरत नहीं कि धारावाहिक सुपरहिट रहा। गुलजार के साथ जगजीत चित्रा भी लोकप्रियता के शिखर पर जा पहुंचे। गुलजार मिर्जा गालिब के बारे में इस तरह बात करते हैं जैसे ये कल की ही बात हो।
क्रमश:

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