श्रमिक संगठनों की हड़ताल के निहितार्थ

सवाल यह है कि हर बार सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए कर्मचारियों को हड़ताल का सहारा क्यों लेना पड़ता है? क्या सरकार अपने कर्मचारियों की मांगों के प्रति असंवेदनशील रवैया अपना रही है या लालफीताशाही के व्यवहार के चलते स्थितियां दिनोंदिन बिगड़ रही हैं? क्या मांगों को मनवाने के लिए हड़ताल को पहले और अंतिम विकल्प की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है? क्या कर्मचारी संगठनों को जनता की परेशानी की कोई चिंता नहीं है?

Sanjay Sharma

अपनी मांगों को लेकर एक बार फिर श्रमिक संगठनों ने देशव्यापी हड़ताल की। बैंक, डाक व बीमाकर्मियों ने काम-काज ठप कर दिया और सड़क पर उतर आए। कई स्थानों पर ट्रेनें रोकी गईं। कुछ राज्यों में झड़प भी हुई। हड़ताल से करोड़ों का नुकसान हुआ और जनता को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। सवाल यह है कि हर बार सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए कर्मचारियों को हड़ताल का सहारा क्यों लेना पड़ता है? क्या सरकार अपने कर्मचारियों की मांगों के प्रति असंवेदनशील रवैया अपना रही है या लालफीताशाही के व्यवहार के चलते स्थितियां दिनोंदिन बिगड़ रही हैं? क्या मांगों को मनवाने के लिए हड़ताल को पहले और अंतिम विकल्प की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है? क्या कर्मचारी संगठनों को जनता की परेशानी की कोई चिंता नहीं है? क्या वार्ता या अन्य तरीकों से अपनी बात सरकार तक नहीं पहुंचाई जा सकती है? क्या हड़तालों से देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर नहीं पड़ेगा? क्या प्रशासन और कर्मियों के बीच समन्वय की कमी के कारण हालात बदतर हो रहे हैं?
कई सालों से देश में हड़तालों का दौर चल रहा है। यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए यह किसी जानलेवा बीमारी से कम नहीं है। जनता को भी फजीहत झेलनी पड़ती है। हकीकत यह है कि हड़ताल की नौबत इसलिए आती है क्योंकि सरकार, कर्मचारियों की मांगों को लेकर संवेदनशीलता नहीं दिखाती है। अफसरशाही में कर्मचारियों की समस्याओं को वार्ता के जरिए हल करने की इच्छाशक्ति का अभाव है। जब मांगों पर कोई सुनवाई नहीं होती है तो कर्मचारियों के पास हड़ताल के सिवा कोई चारा नहीं बचता है। श्रमिक संगठनों की हड़ताल इसी का नतीजा है। ये संगठन अपनी विभिन्न मांगों मसलन पुरानी पेंशन बहाली और मनमानी तरीके के निर्धारित की गई श्रम नीतियों में संशोधन और वापसी की मांग कर रहे हैं लेकिन इसका कोई सार्थक जवाब उन्हें नहीं मिल रहा है। लिहाजा वे सड़क पर उतर आए हैं। सरकार को चाहिए कि वह श्रमिक संगठनों की बातों को संवेदनशील तरीके से सुने और उसका उचित और त्वरित हल निकाले। इसके अलावा प्रशासन और कर्मचारियों के बीच समन्वय स्थापित करे ताकि समस्याओं के मूल कारण को समय रहते समझा जा सके। कर्मचारी और श्रमिक संगठनों को भी हड़ताल के अलावा किसी अन्य तरीके से अपनी समस्याओं के हल पर विचार करना चाहिए ताकि जनता को परेशानी न उठानी पड़े। साथ ही देश का भी नुकसान न हो। यदि सरकार ने कर्मचारियों के हितों की चिंता नहीं की तो स्थितियों में सुधार नहीं होगा।

Loading...
Pin It