संगीत से दिया सद्भाव का संदेश

इसी साल उन्होंने तीन एलबम और संगीत प्रेमियों के लिए पेश किए। ये थे- विजन्स, मन जीते जगजीत और कहकशां । कहकशां दूरदर्शन के लिए गजल के सफरनामे पर आधारित धारावाहिक था । इसमें अनेक शायरों की रचनाएं शामिल थीं । इसमें जोश मलीहाबादी की एक रचना को स्वर देकर जगजीत ने अविस्मरणीय बना दिया। यह रचना थी- बोल इकतारे झन झन झन झन, सबके काजल मेरे पारे, सबकी आंखें मेरे तारे, सबकी सांसें मेरे धारे, सारे इंसां मेरे प्यारे, सारी धरती मेरा आंगन, विजन्स भी बड़ा लोकप्रिय हुआ ।

राजेश बादल

सी साल उन्होंने तीन एलबम और संगीत प्रेमियों के लिए पेश किए। ये थे- विजन्स ए मन जीते जगजीत और कहकशां । कहकशां दूरदर्शन के लिए गजल के सफरनामे पर आधारित धारावाहिक था । इसमें अनेक शायरों की रचनाएं शामिल थीं। इसमें जोश मलीहाबादी की एक रचना को स्वर देकर जगजीत ने अविस्मरणीय बना दिया। यह रचना थी- बोल इकतारे झन झन झन झन, सबके काजल मेरे पारे, सबकी आंखें मेरे तारे, सबकी सांसें मेरे धारे, सारे इंसां मेरे प्यारे, सारी धरती मेरा आंगन विजन्स भी बड़ा लोकप्रिय हुआ । इसमें राणा शहरी की गजल कोई दोस्त है न रकीब है, तेरा शहर कितना अजीब है, आज के दौर के हिन्दुस्तान की सच्चाई है।
इसके अलावा बशीर बद्र की गजलें-सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा, इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जाएगा और हम तो दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ भी चल पड़े हम रास्ता हो जाएगा। उन्नीस सौ बानवे भारतीय गजल संसार का एक महत्वपूर्ण साल है। जगजीत ने इस साल सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के साथ एक एलबम सजदा देश के संगीत प्रेमियों को उपहार में दिया था । भारतीय गजल संसार में अपने किस्म का पहला प्रयोग । इस संग्रह में एक रचना बेहद लोकप्रिय हुई थी। निदा फाजली की यह गजल हमारे अपने अकेलेपन का अहसास है। हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी, फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी। अक्सर ऐसा होता है कि गद्य या पद्य में उस दौर के समाज की हालत का बयान भी नजर आता है। निदा फाजली की कलम से भी एक ऐसा ही बदलते वक्त का दस्तावेज निकला। यह था-किसको कातिल मैं कहूं , किसको मसीहा समझूं, सब यहां दोस्त ही बैठे हैं किसे क्या समझूं। इसी साल याने उन्नीस सौ बानवे में धमाकेदार एलबम इनसर्च आया । इस एलबम में कतील शिफाई की एक श्रृंगारिक रचना बड़े सम्मोहित अंदाज में जगजीत ने गाई थी। यह थी- अपने होठों पर सजाना चाहता हूं, आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूं, इसके अलावा हमको आईना दिखाती निदा की एक और शानदार गजल इसी संग्रह में थी। यह थी-जब किसी से कोई गिला रखना सामने अपने आईना रखना। घर की तामीर चाहे जैसी हो इसमें रोने की कुछ जगह रखना, को जगजीत सिंह ने अपने ढंग से गाकर जैसे एक सन्देश हम तक पहुंचा दिया था। उन्नीस सौ तिरानवे में आए दो एलबम- मां और इनसाइट । मां तो धार्मिक था और इनसाइट में निदा फाजली गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला।
अगले अठारह साल तक जगजीत ने अपने चाहने वालों को निराश नहीं किया। हालांकि इनमें से अनेक एलबम ऐसे थे, जिनमें पुराने एलबम से रचनाएं शामिल कीं गईं थीं । कुछ एलबम धार्मिक थे और कुछ जगजीत की पसन्द वाले फिल्मी गीतों के थे । इनके बारे में अगली किसी कड़ी में जिक्र करेंगे। अभी देखते हैं कि इन अठारह वर्षों में कौन-कौन से संग्रह जारी हुए। ये थे- उन्नीस सौ चौरानवे- फेस टू फेस और पेशन्स। उन्नीस सौ पंचानवे में आया क्राई फॉर क्राई। इस एलबम की कुछ रचनाओं ने भी संगीत प्रेमियों का ध्यान खींचा था । वजह ये थी कि इस एलबम में कुछ समस्याओं को भी गंभीरता से जगह दी गई थी । इस संग्रह से जगजीत अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति संवेदनशील नजर आए । इस संग्रह की एक नज्म खलील धनतेजवी की थी। इसमें महंगाई का अपने ढंग से ही बयान था। एक बानगी-अब मैं राशन की कतारों में नजर आता हूं, अपने खेतों से बिछडऩे की सजा पाता हूं, इतनी महंगाई के बाजार से कुछ लाता हूं, अपने बच्चों में उसे बांट के शर्माता हूं,् इसी तरह सुदर्शन फाकिर के एक सवाल के माध्यम से जगजीत ने सांप्रदायिक सद्भाव का नायाब सन्देश दिया था। यह सवाल था-आज के दौर में ऐ दोस्त ! ये मंजर क्यों है ? जख्म हर सर पे ए हर हाथ में पत्थर क्यों है ? जब हकीकत है कि हर जर्रे में तू रहता है, फिर जमीं पर कहीं मस्जिद, कहीं मन्दिर क्यों है।
क्रमश:

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