सांसदों का अशालीन आचरण कब तक

 ललित गर्ग

संसद राष्ट्र की सर्वोच्च संस्था है। देश का भविष्य संसद के चेहरे पर लिखा होता है। यदि वहां भी शालीनता एवं सभ्यता का भंग होता है तो दुनिया के सबसे बड़ेे लोकतंत्र होने के गौरव का आहत होना निश्चित है। सात दशक के बाद भी भारत की संसद सभ्य एवं शालीन नहीं हो पाई है तो ये स्थितियां दुर्भाग्यपूर्ण एवं विडम्बनापूर्ण ही कही जायेगी। एक बार फिर ऐसी ही त्रासद स्थितियों के लिये लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को पिछले दो दिन में कुल 45 सांसदों को सत्र की बची हुई बैठकों से निलंबित करने का कठोर फैसला लेना पड़ा है। इस तरह का कठोर निर्णय हमारे सांसदों के आचरण पर एक ऐसी टिप्पणी है जिस पर गंभीर चिन्तन की अपेक्षा है। छोटी-छोटी बातों पर अभद्र एवं अशालीन शब्दों का व्यवहार, हल्ला, छींटाकशी, हंगामा और बहिर्गमन आदि घटनाओं का संसद के पटल पर होना दुखद त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण है। इससे संसद की गरिमा एवं मर्यादा को गहरा आघात लगता है। ऐसे सांसदों को निलम्बित किया ही जाना चाहिए।
निलम्बन की सबसे बड़ी घटना वर्ष 1989 में हुई। तब इंदिरा गांधी की हत्या की जांच से संबंधित ठक्कर आयोग की रिपोर्ट संसद में रखे जाने के मुद्दे पर हुए हंगामे के दौरान तत्कालीन लोकसभाध्यक्ष ने 63 सांसदों को निलंबित किया था। अगस्त 2015 में कांग्रेस के 25 सदस्यों को काली पट्टी बांधने एवं कार्यवाही बाधित करने पर निलंबित किया था। फरवरी 2014 में लोकसभा के शीतकाल सत्र में 17 सांसदों को 374 ए के तहत निलंबित किया गया था। अगस्त 2013 में मानसून सत्र के दौरान कार्यवाही में रुकावट पैदा करने के लिए 12 सांसदों को निलंबित किया था। इन निलंबन घटनाओं को छोड़ दें तो हाल के वर्षों में संख्या के हिसाब से सांसदों को निलंबित करने का यह आंकड़ा वाकई बेहद चैंकाने वाला है। निलंबित किए गए सांसदों में 31 अन्नाद्रमुक के, 13 टीडीपी और एक वाईएसआर कांग्रेस के टिकट से जीती असंबद्ध सांसद हैं। निलंबित सांसदों में टीडीपी के गजपति राजू भी हैं जो कभी इसी सरकार में नागर विमानन मंत्री हुआ करते थे। अन्नाद्रमुक कर्नाटक सरकार द्वारा कावेरी पर बनाए जाने वाले बांध का विरोध कर रही है तो टीडीपी आंध्र प्रदेश का विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग कर रही है लेकिन इसके लिए उन्होंने जो तरीका अपनायाए वह आपत्तिजनक था। सांसद चाहे जिस दल के हो उनसे शालीन एवं सभ्य व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। लेकिन सांसद अपने दूषित एवं दुर्जन व्यवहार से संसद को शर्मसार करते रहते हैं। सार्वजनिक जीवन में सभी एक विचारधारा, एक शैली व एक स्वभाव के व्यक्ति नहीं होते। अत: आवश्यकता है दायित्व के प्रति ईमानदारी के साथ आपसी तालमेल व एक दूसरे के प्रति गहरी समझ की। अगर हम सांसदों में आदर्श स्थापित करने के लिए उसकी जुझारू चेतना को विकसित कर सकें तो निश्चय ही आदर्शविहिन असंतुष्टों की पंक्ति को छोटा कर सकेंगे और ऐसा करके ही संसद को गरिमापूर्ण मंच बना पायेंगे। विडम्बना यह है कि सांसदों के दूषित व्यवहार के कारण हमारी संसद की कामकाज की अवधि ही घट गई है। पिछले दस साल में संसद की सालाना बैठकें औसतन 70 से भी कम रह गई है। ऐसे में सदन के कामकाज को बाधित करना तो और भी क्षुब्ध करता है। क्या उम्मीद करें कि एक साथ इतने सांसदों का निलंबन जनप्रतिनिधियों की अन्तर्चेतना को झकझोरने का काम करेंगी। क्या सांसद संसद के अंदर अपना आचरण सुधारने के लिए अग्रसर होंगे।
संसद हो या राष्ट्र केवल व्यवस्था से ही नहीं जी सकता। उसका नैतिक पक्ष भी सशक्त होना चाहिए। किसी भी राष्ट्र की ऊंचाई वहां की इमारतों की ऊंचाई से नहीं मापी जाती बल्कि वहां के शासकों एवं जनप्रतिनिधियों के चरित्र से मापी जाती है। उनके काम करने के तरीके से मापी जाती है। हमारी सबसे बड़ी असफलता है कि आजादी के सात दशकों के बाद भी जनप्रतिनिधियों का राष्ट्रीय चरित्र नहीं बन पाया। स्वार्थ सिद्धि के लिए कत्र्तव्य को गौण कर दिया है। इस तरह से जन्मे हर स्तर पर अशालीन एवं असभ्य व्यवहार ने राष्ट्रीय जीवन में एक विकृति पैदा कर दी है। आज प्रबुद्ध मत है कि गांधीजी ने नैतिकता दी पर व्यवस्था को नैतिक नहीं बना पाये। हालांकि गांधीजी ने नैतिकता को स्थायी जीवन मूल्य बनाया था। पर सत्ता प्राप्त होते ही वह नैतिकता खिसक गई। जो व्यवस्था आई उसने विपरीत मूल्य चला दिये।
आज हमारी व्यवस्था चाहे राजनीति की हो, सामाजिक हो, पारिवारिक हो धार्मिक हो औद्योगिक हो शैक्षणिक हो चरमरा गई है। दोषग्रस्त हो गई है। प्रगतिशील कदम उठाने वालों ने और जनप्रतिनिधियों ने अगर व्यवस्था सुधारने में मुक्त मन से सहयोग नहीं दिया तो हमारी सारी प्रगति बेमानी होगी।

Loading...
Pin It