…सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला

विवेक और बेटी मोनिका के साथ दिन अच्छे कट रहे थे। लेकिन जिंदगी में सब कुछ इंसान के हाथ में नहीं होता। जब आप भविष्य के सुनहरे सपने बुन रहे होते हैं तो कहीं दूर कोई बैठा हकीकत की पथरीली जमीन पर आपको पटखनी देने की पटकथा लिख रहा होता है । जगजीत-चित्रा के साथ ऐसा ही हुआ । परिवार की खुशियों को किसी की नजर लग गई । एक भयानक काली रात जगजीत-चित्रा के उजाले का सूरज अचानक डूब गया ।

राजेश बादल

वेक और बेटी मोनिका के साथ दिन अच्छे कट रहे थे। लेकिन जिंदगी में सब कुछ इंसान के हाथ में नहीं होता। जब आप भविष्य के सुनहरे सपने बुन रहे होते हैं तो कहीं दूर कोई बैठा हकीकत की पथरीली जमीन पर आपको पटखनी देने की पटकथा लिख रहा होता है । जगजीत-चित्रा के साथ ऐसा ही हुआ । परिवार की खुशियों को किसी की नजर लग गई। एक भयानक काली रात जगजीत-चित्रा के उजाले का सूरज अचानक डूब गया । अठारह साल का नौजवान विवेक सडक़ हादसे में वहां जा बैठा, जहां से लौटकर कोई नहीं आता। माता पिता की आंखों के सामने जवान बेटे की चिता। जगजीत और चित्रा ने जिंदगी में बहुत खराब दौर देखा था लेकिन विवेक तो अपने साथ दोनों की जान भी ले गया था। दो जिंदा लाशें पागलों की तरह भटक रहीं थीं ।
घर में मरघट सा सन्नाटा पसरा था । दो बेजोज फनकार अपने अपने रोल में बन्द होकर रह गए । किसे दोष देते । बेटी मोनिका दोनों का सहारा बन गई मगर विवेक तो विवेक था। उसकी कमी कौन पूरी कर सकता था । घर उजड़ गया था । चित्रा के चेहरे पर आज भी उस हादसे की सिहरन साफ नजर आती है । कहते हैं वक्त हर घाव भर देता है लेकिन यह घाव ऐसा था जो भरने का नाम ही नहीं ले रहा था। चित्रा गूंगीं हो गईं। गले से सुरों का रिश्ता टूट गया। अट्ठाईस जुलाई उन्नीस सौ नब्बे के बाद से आज तक चित्रा सिंह को किसी ने गाते नहीं देखा।
जगजीत किरच-किरच होकर बिखर गए थे। किसी तरह अपने आप को समेटा और अपने दर्द की सारी दौलत चाहने वालों पर लुटा दी । गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिए कुछ तो करना ही था। कुछ महीने की खामोशी के बाद लोगों ने जगजीत का नया रूप देखा । भीड़ में अकेला । हर पल उचाट । किसी शो में नौजवान नजर आते तो उनमें विवेक को ढूंढता। हॉल में तालियों की गडग़ड़ाहट गूंजती रहती और उधर शो के बाद ग्रीनरूम में बन्द जगजीत फूट फूट कर रोते हुए विवेक के नाम पर आंसू की नदियां बहा रहा होता । यही जिंदगी है । अपनी रफ्तार से चलती हुई । विवेक के जाने के बाद दर्द के इस दरिया से निकला एक और नया एलबम सामने आया। यह एलबम था सम वन सम व्हेयर । इसमें जगजीत एक गजल गाते हैं और सुनने वाला एक दूसरे लोक में चला जाता है। सुदर्शन की यह अनमोल रचना थी। आदमी आदमी को क्या देगा, जो भी देगा वही खुदा देगा।
जगजीत के चाहने वालों ने महसूस किया कि आवाज में एक खास मिठास और प्रौढ़ता आ गई है । जगजीत कुछ कुछ आध्यात्मिक हो गया था । मगर अंदर का सूनापन बरकरार था। बाहर से शो करता विदेश यात्राएं भी होतीं और करोड़ों चाहने वालों का प्यार भी बटोरता लेकिन अंदर ही अंदर सब कुछ खाली और वीरान । जिंदगी के बियाबान में फैला दूर तक रेगिस्तान। एक बार फिर जगजीत ने चाहने वालों के लिए भजनों और गीतों की गंगा बहा दी। हर एलबम और हर गजल के बारे में लिखना तो संभव नहीं। अलबत्ता कुछ नमूने हम इस कहानी में आपको बताते चलेंगे।
अगला साल यानी उन्नीस सौ इक्यानवे आया और जगजीत शानदार एलबम, होप लेकर आए । वही दार्शनिक अंदाज। इससे लगता है कि विवेक के जाने के बाद जगजीत अभी तक सामान्य नहीं हो पाए थे। इस एलबम की एक गजल बड़ी मकबूल हुई थी। यह थी, उसको रुखसत तो किया था मुझे मालूम न था..सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला इक मुसाफिर के सफर जैसी है सबकी दुनिया कोई जल्दी में कोई देर से जाने वाला।
क्रमश:

 

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