लैंगिक असमानता के विरुद्ध

डॉ अनुज लुगुन
पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के आगरा में संजली नाम की एक लडक़ी को जलाकर मार देने की दहला देनेवाली घटना हुई। अपराधियों ने न केवल बेरहमी से लडक़ी को जलाकर मार डाला, बल्कि उनके परिवार वालों को फोन पर धमकी भी दी। अपराधियों को यह दुस्साहस कहां से आता है ? आमतौर पर हम यह स्वीकार नहीं करते हैं कि इस तरह की घटनाओं के पीछे स्त्रियों के बारे में समाज में प्रचलित धारणाएं काम करती हैं। ‘लडक़ी ही तो है’ इस तरह स्त्रियों को दोयम दर्जे का माननेवाला विचार उनके विरुद्ध भविष्य में कितनी बड़ी घटनाओं को जन्म दे सकता है, हम इस पर विचार नहीं करते। हमारे ही घर-परिवारों में इस तरह का प्रशिक्षण चलता है।
एक तरफ लड़कियों को हीन बना दिया जाता है, तो दूसरी तरफ लडक़ों में अहं का भाव भरा जाता है। जहां लड़कियों को हर समय समझौता करना सिखाया जाता है, वहीं लडक़ों की हर जरूरत और जिद पूरी की जाती है। यही विचार समाज में परिपक्व होकर बाहर निकलता है। खासतौर पर लडक़े उस पुरुषवादी विचार से लैस हो जाते हैं, जो लैंगिक श्रेष्ठता से ग्रसित है। ऐसे में किसी लडक़ी का ‘न’ कहना उनके पुरुषवादी अहं को चोट पहुंचाता है और प्रत्युत्तर में किया गया उनका आपराधिक कृत्य उन्हें विचलित भी नहीं करता। लड़कियों के विरुद्ध होनेवाली आपराधिक घटनाओं के पीछे पुरुषवादी विचार बहुत गहरे स्तर पर शामिल रहता है। ऐसे में अगर लडक़ी दलित-वंचित समुदाय की हो, तो उसकी त्रासदी और बढ़ जाती है। हमारे देश के जातिवादी सामाजिक ढांचे में पुरुषवादी विचार और भी क्रूर और हिंसक है। इसे कई तरीकों से सामाजिक मान्यता मिलती रहती है।
नारीवादी विचारक जोर देकर कहती हैं कि ‘लड़कियां पैदा नहीं होतीं’, बल्कि ‘लड़कियां बनायी जाती हैं’। यह विचार पितृसत्तात्मक मूल्यों को अप्राकृतिक और हास्यास्पद लगता है। वे इसे न केवल नकारते हैं, बल्कि अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए इसका उपहास भी उड़ाते हैं। क्या यही पितृसत्तात्मक विचार स्त्रियों के विरुद्ध होनेवाले अपराध में शामिल नहीं होता है? हमारे समाज के वर्चस्ववादी इस लैंगिक भिन्नता को लगातार कायम करते हुए चले आ रहे है। उनका यह विचार सामाजिक संस्थाओं को जकडक़र रखा है। संस्कार और मान्यताओं के नाम पर इसे संचालित किया जाता है। धर्म, राजनीति, शिक्षण हर जगह यह मौजूद है। यह सिर्फ हमारे ही समाज में नहीं है, बल्कि वैश्विक समाज में बहुत गहराई के साथ व्याप्त है।
हमारे देश में केरल के सबरीमाला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध बना हुआ है। धार्मिक कट्टरपंथी इस बात को स्वीकार नहीं कर रहे हैं कि भगवान अयप्पा के दर्शन का अधिकार स्त्रियों को भी होना चाहिए। माना जाता है कि अयप्पा ब्रह्मचारी थे, इसलिए रजस्वला स्त्रियों को उनके मंदिर में प्रवेश की इजाजत नहीं है। रजस्वला यानी पीरियड्स होनेवाली उम्र की स्त्रियों को धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अपवित्र माना जाता है। यह सदियों पुरानी मान्यता है। यह आधुनिक समय के विचार के उलट है। आज के समय में यह स्त्रियों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने उनके मौलिक अधिकारों के मद्देनजर अयप्पा मंदिर में उनके प्रवेश की अनुमति दी है। लेकिन, पुरातन धार्मिक विचार के पालक इस विचार को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। इसे वे अपनी परंपरा के विरुद्ध मान रहे हैं।
आधुनिक समय के कठोर कानूनों के बावजूद आज भी यह समस्या खत्म नहीं हुई है। परंपरा के नाम पर यह विचार आज भी मजबूती के साथ मौजूद है। स्त्रियों के विरुद्ध लैंगिक भेद सदियों से बना हुआ है। ‘थर्ड जेंडर’ को तो समाज ने मनुष्य ही नहीं माना। उसे जन्म लेते ही समाज से बाहर कर दिया जाता है। वह तो लैंगिक असमानता का दोहरा अभिशाप झेलता है। हमें यह समझना चाहिए कि जो व्यवहार समय के साथ संगत नहीं बनाता, वह परंपरा नहीं होती बल्कि वह रूढि़ होती है। यही रूढि़ आधुनिक विचारों से टकराती है और अपराध को जन्म देती है। परंपरा तो समय के साथ तालमेल बनाती हुई चलती है।
इस दरम्यान केरल की महिलाओं ने छह सौ बीस किलोमीटर लंबी मानव शृंखला बनाकर लैंगिक असमानता के विरुद्ध एक बड़ा प्रदर्शन किया है। उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता की बात कही है। यह उम्मीद है उन रूढिय़ों के विरुद्ध, जो समाज के वंचित तबकों के विरुद्ध अपराध को जन्म देती हैं। जो किसी स्त्री को स्त्री होने के नाते कहीं वर्जित करती हैं, तो कहीं उसके जीने के अधिकार को ही छीन लेती हैं।

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