लंदन में स्टार बन गये जगजीत

एक दिन एचएमवी का एक और प्रस्ताव मिला। नए रिकॉर्ड का। जगजीत-चित्रा का पहला धमाकेदार एलबम। द अनफॉर्गेटेबल्स-भारतीय और पश्चिमी वाद्य यंत्रों का अनूठा संगम। एलबम ने इस जोड़ी को रातों रात स्टार बना दिया । हिन्दुस्तान के लोगों ने देखा कि किस तरह गजल अमीरों की महफिल से निकल कर आम आदमी के घर में जा बैठी थी। इस एलबम की गजलें आज भी हमें सम्मोहित करती हैं।

राजेश बादल

क दिन एचएमवी का एक और प्रस्ताव मिला। नए रिकॉर्ड का। जगजीत-चित्रा का पहला धमाकेदार एलबम। द अनफॉर्गेटेबल्स-भारतीय और पश्चिमी वाद्य यंत्रों का अनूठा संगम । एलबम ने इस जोड़ी को रातों रात स्टार बना दिया । हिन्दुस्तान के लोगों ने देखा कि किस तरह गजल अमीरों की महफिल से निकल कर आम आदमी के घर में जा बैठी थी। इस एलबम की गजलें आज भी हमें सम्मोहित करतीं हैं। एक तो ‘आहिस्ता आहिस्ता’दूसरी ‘बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी’ तीसरी ‘एक न एक शम्मा जलाए रखिए’ चौथी ‘आए हैं समझाने लोग।’
असल में इस एलबम की रिकॉर्डिंग तो हो चुकी थी लेकिन कंपनी ने इसे बाजार में नहीं उतारा था। इसी बीच जगजीत-चित्रा को कुवैत के शेख का न्यौता मिला और ये परिवार लंबी यात्रा पर निकल पड़ा। कुवैत में शानदार महफिलों के बाद दुबई और वहां से फ्रेंकफर्ट होते हुए लंदन। लंदन के अल्बर्ट हॉल में तो जगजीत ने वो धमाका किया कि ब्रिटेन ही नहीं, सारी दुनिया के गजल प्रेमी उन्हें एक स्टार की तरह मानने लगे थे। इस यात्रा में जगजीत के अपने साजिंदे थे। इनमें से एक थे क्लेरेन्स पीटरसन। पीटरसन अब मुंबई में रहते हैं लेकिन जगजीत का नाम लेते ही उनकी बूढ़ी आंखों में चमक आ जाती है। लंदन के इस दौरे का एक-एक पल पीटरसन को अभी तक याद है । छह महीने बाद जब जगजीत चित्रा लौटे तो हक्के-बक्के थे। अनफॉरगेटेबल ने लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। आते ही कंपनी ने अस्सी हजार रूपए की रॉयल्टी का चेक भेंट किया। उन्नीस सौ छियत्तर । अस्सी हजार रूपए । जगजीत-चित्रा को जैसे खजाना मिल गया। हिन्दुस्तान के गजल संसार में ये एक खामोश क्रान्ति थी। एक बात आप जानते हैं कि अनफॉगेटेबल का कवर डिजाइन किया था खुद चित्रा जगजीत और चित्रा के पहले पति दत्ता साहब ने और इसे नाम दिया था चित्रा के पिताजी ने। जगजीत को इस रिकॉर्ड ने एक और अनमोल तोहफा दिया। पिताजी का गुस्सा गायब हो चुका था। अब उन्हें बेटे पर नाज था। जगजीत ने तय किया कि बेटे विवेक को दादा दादी और नाना नानी से मिलना चाहिए। वो लुधियाना जा पहुंचे, जहां पिताजी मां और बहनों के साथ रहते थे। घर पर विवेक को भरपूर प्यार मिला। इसके बाद जगजीत चित्रा और विवेक को लेकर कोलकाता गए। चित्रा के माता पिता से अभी तक वो नहीं मिले थे । चित्रा के माता पिता को तो देबू दत्ता से चित्रा के तलाक और जगजीत से शादी की खबर तक नहीं थी। जब वो जगजीत से मिले तो उन्हें अंदाजा हो गया कि बेटी का चुनाव गलत नहीं था। बाद में तो जगजीत को उन्होंने बेटे की तरह माना। जगजीत भी उन्हें साथ रहने के लिए मुंबई लेकर आ गए थे। जगजीत सबके लिए कुछ न कुछ करना चाहते थे। हरदम मदद के लिए तैयार। चित्रा के माता पिता के लिए एक फ्लैट खरीदा तो भाई करतार सिंह को भी अपने साथ मुंबई ले आए। माता-पिता के लिए भी दिल्ली से सटे गाजियाबाद में एक घर खरीदा । अभी हमने आपको बताया था कि जगजीत किशोरावस्था से ही सूफियाना और आध्यात्मिक रुझान वाले थे। जब शिमला गए थे तो पंजाबी के लोकप्रिय कवि शिव कुमार बटालवी से मिले थे। बटालवी उन दिनों लंबे समय तक स्वास्थ्य लाभ के लिए शिमला आए थे। जगजीत के अंतर्मन को बटालवी ने झकझोर दिया। तब से एक दबी चाह थी-काश कभी बटालवी की कविताएं गाने का मौका मिले। जिंदगी में ऐसे अवसर आते हैं जब आप शिखर पर पहुंच रहे होते हैं तो समाज आपकी इच्छा के आगे सर झुकाता है लेकिन जब तक आप गुमनाम रहते हैं तो न जाने कितनी इच्छाएं दहन हो जातीं हैं।
क्रमश:

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