आधुनिक दौर में ये असहाय बुजुर्ग

एनके सिंह

हाल ही में अपने प्रचलित टीवी सीरियल में देश के जाने -माने अदाकार अमिताभ बच्चन ने एक समाजसेवी रवि कालरा को बुलाया था। कालरा देश के असहाय बुजुर्गों और सडक़ पर बीमारी के कारण अंतिम सांस ले रहे गरीबों को उठाकर अपने आश्रम लाते हैं और उनकी मुफ्त सेवा करते हैं। देश की तमाम संस्थाओं, सरकारों व मंत्रियों ने उनके कार्य की सराहना में उन्हें समय-समय पर सम्मानित किया है। कालरा ने इस कार्यक्रम में एक घटना बताई जिसमें एक दिन दो युवक एक महंगी गाड़ी से उतरे और अपना परिचय देते हुए उनसे अपने बूढ़े पिता को आश्रम में रखने का अनुरोध किया। पिता की हालत काफी खराब लग रही थी और वे जिस स्थिति में बैठा दिया जाता था उसी स्थिति में घंटों बैठे रहते थे। स्वयं हिल भी नहीं पाते थे, बोलना, स्वयं खाना या दैनिक कार्य करना तो दूर की बात थी। रवि कालरा बताते हैं कि मैंने उनसे कहा कि यह आश्रम गरीबों और बेसहारों के लिए है और आप स्वयं अपने को किसी कंपनी का सीईओ बता रहे हैं। आप अपने पिता को रखने और इलाज कराने में हर तरह से सक्षम लगते हैं लिहाजा यह आश्रम आप जैसे लोगों के अनुरोध को नहीं मान सकता। मैंने उन्हें यह भी सलाह दी कि मां-बाप की सेवा बेटों का नैतिक ही नहीं कानूनी दायित्व भी है। सलाह पर कुछ नाराजगी दिखाते हुए वे दोनों चले गए। इसके कुछ ही घंटों के बाद मेरे पास एक काल आया। कॉलर ने कहा कि तूने बूढ़े को नहीं रखा था लेकिन मैंने उसे हरिद्वार जाने वाली गाड़ी पर बैठा दिया।
अमिताभ बच्चन हीं नहीं जिसने यह किस्सा सुना वह अपनी आंखे पोंछता नजर आया। भारत में ऐसा दौर आया है जिसमें हर रोज अखबारों और चैनलों में खबर मिलती है कि बुजुर्ग महिला की सड़ी-गली लाश मुंबई के पॉश इलाके के एक फ्लैट से बरामद हुई और उसके बेटे -बेटियां विदेश में रहते हैं या अलग मकान ले कर रह रहे हैं। स्वार्थ का आर्थिक स्थिति से कोई रिश्ता नहीं होता। गरीब तो शायद लोक-लाज की वजह से यह जिम्मेदारी निभा भी रहे हैं पर द्वितीयक सामाजिक संबंधों की बुनियाद पर खड़े मुंबई के बांद्रा और दिल्ली के फ्रेंड्स कॉलोनी में जब ऐसी घटनाएं सुनने को मिलती हैं तो समझ में आता है कि नैतिकता और आर्थिक सम्पन्नता का प्रतिलोमानुपाति रिश्ता है। कुछ महीने पहले देश की परिधान और फैब्रिक्स की एक बड़ी ब्रांडेड कंपनी के मालिक को किराये के मकान में जिन्दगी के बाकी दिन गुजारने की खबरें देखने को मिलीं। जिस पिता ने भारतीय संस्कृति और मूल्य- व्यवस्था के तहत बेटों की हंसी में ही अपनी खुशी देखी थी और उसके लिए हर कुर्बानी देता रहा। उसे यह विश्वास नहीं हो पाता कि कोई बेटा अपने आर्थिक भविष्य के लिए मां-बाप को आसानी से सडक़ पर घुट-घुट कर या तिल -तिल मरने के लिए छोड़ सकता है या पॉश फ्लैट में किसी रात बगैर किसी चिकित्सकीय मदद के दिल के दौरे के बाद मरने को मजबूर होने दे सकता है। सड़ी-गली लाश का मतलब बेटा-बेटियों ने कई दिन तक दो क्षण और बगैर किसी खर्च के मोबाइल कॉल कर भी हाल चाल नहीं लिया। कार्ल मार्स के समाज की संरचना के सिद्धांत के अनुसार तत्कालीन उत्पादन व्यवस्था ही समाज के हर सम्बन्ध, संस्थाएं और शासन पद्धति को निर्धारित करती हैं। जो वैल्यू सिस्टम कृषि आधारित अर्थ-व्यवस्था में थे वे औद्योगीकरण के समय विलुप्त होते गए और समाज संयुक्त परिवार से हट कर एकल परिवार की ओर चला गया। यही वजह है कि पूरे भारतीय समाज में एक अजीब सा संकट पैदा हो गया है। बंगलुरू में पांच नयी अदालतें खोली गयी हैं जो केवल बढ़ते तलाक के मामले का निपटारा करेंगी। आज से कुछ दशक पहले तक आमतौर पर पति-पत्नी का साथ जन्म -जन्मान्तर का बताया जाता था। आज लोग बेधडक़ बताते हैं कि मेरी दूसरी शादी है। यह कहते हुए उसके चेहरे पर कहीं कोई पश्चाताप नहीं रहता।
संकट यह है कि इस संधि काल में एक तरफ पुरानी संस्कृति वाले मां-बाप बेटे के भविष्य बनाने के लिए हर कुर्बानी कर रहे हैं और उधर बेटा वैसी ही वेतन पाने वाली सहयोगी से शादी करता है और फिर दोनों कॅरियर बनाने के लिए विदेश रवाना हो जाते हैं। बूढ़े अभिभावक इसमें भी खुश होते हैं कि बच्चों का भविष्य बनेगा तो उनका परलोक भी।
मौलिक और सबसे प्राकृतिक मानवीय संबंधों में बदलाव आज सेवा क्षेत्र पर आधारित अर्थ-व्यवस्था का सबसे बड़ा झटका है। इस संधि काल में जितनी जल्दी सरकारी व स्वयंसेवी संस्थाएं बूढ़े अभिभावकों को यह समझा सकें कि इस मूल्य और प्रेम-जनित समर्पण की नियति नए दौर में केवल ऊपर से नीचे बहने की है और इसमें नीचे से ऊपर का प्रवाह पैदा करने के लिए शायद हीं कोई श्रवण कुमार पैदा होगा लिहाजा अनाथाश्रम ही उनका आखिरी पड़ाव है। पूरी दुनिया के हजारों साल के इतिहास में भौतिक विकास के पथ पर उल्टा चलना नहीं हुआ। लिहाजा हम इसे रोक नहीं सकते। तो उपाय एक ही है।
(लेखक-वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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