ऊसर को उपजाऊ बनाने वाले भूमि सुधार निगम की हालत खस्ता, मंझधार में कर्मियों का भविष्य

  • परियोजना विस्तारीकरण के लिये कार्ययोजना नहीं बना पाया निगम तंत्र
  • अब तक चार लाख हेक्टेयर ऊसर भूमि को बनाया गया उपजाऊ, सात लाख किसान हुये लाभान्वित
  • विश्व बैंक परियोजना की अवधि खत्म होते ही बढ़ जाएगा संकट

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। प्रदेश सरकार के उद्देश्यों में प्रमुख रोजगार और किसानों की आय दोगुनी करने में उपयोगी भूमिका निभाने वाला उत्तर प्रदेश भूमि सुधार निगम बंद होने की कगार पर है। प्रबंध तंत्र की लापरवाह रवैये के चलते वह न तो चल रही योजना का विस्तारीकरण करा पा रहा है न अन्य प्रोजेक्ट ही हासिल करने की कोशिश कर रहा है। लिहाजा यहां के कर्मचारियों को बेरोजगारी का भय सताने लगा है।
प्रदेश की ऊसर भूमि को सुधारने के उद्देश्य से 1978 में स्थापित भूमि सुधार निगम ने अब तक करीब सात लाख हेक्टेयर ऊसर भूमि को उपजाऊ बनाया है। इससे लाखों किसान लाभांवित हुए हैं। आज उसी निगम का वजूद खतरे में हैं। रिटायरमेंट के करीब पहुंच चुके अधिकतर कर्मचारियों को बेरोजगारी का डर सता रहा है। विश्व बैंक के वित्त पोषण से वर्तमान में निगम द्वारा उत्तर प्रदेश सोडिक लैण्ड रिक्लेमेशन-तृतीय परियोजना संचालित है, जिसकी अवधि 31 दिसम्बर 2018 को समाप्त होगी। लेकिन, योजना अवधि विस्तारीकरण या अन्य प्रोजेक्ट हासिल करने के प्रति निगम प्रबंधन का उपेक्षित रवैया बरकरार रहा। लिहाजा अधिकारियों ने विश्व बैंक के पास न कोई नया प्रोजेक्ट भेजा और न राज्य सरकार के हिस्से का धन पाने के लिये अनुपूरक बजट में भी कोई प्रस्ताव भेजा। निगम प्रबंधन का ध्यान केवल अपनी प्रतिनियुक्ति बढ़वाने में है। इससे मुख्यालय व परियोजना कार्यालयों सहित क्षेत्र में कार्य कर रहे करीब 1000 लोगों को रोजगार छिनने का डर सता रहा है। इसमें उत्तर प्रदेश भूमि सुधार निगम के कर्मचारी, 1994 से निगम में कांट्रैक्ट पर तैनात कर्मचारी और निगम की परियोजनाओं को क्रियान्वित करने वाले एनजीओ में कार्यरत कर्मियों के समक्ष बेराजगारी खड़ी होने वाली है। प्रतिनियुक्ति पर आये कार्मिक भी परेशान हैं। बहरहाल, इनके समक्ष मूल विभाग में वापसी का विकल्प है। उत्तर प्रदेश भूमि सुधार निगम के अध्यक्ष प्रभात कुमार का भी कहना है कि इस संबंध में अब कुछ नहीं हो सकता। यह प्रोजेक्ट बन्द होने जा रहा है। गौरतलब है कि विश्व बैंक से पोषित भूमि सुधार निगम की ओर से प्रदेश में सोडिक लैंड रिक्लेमेशन-3 परियोजना के तहत ऊसर-बीहड़ सुधार का कार्य हो रहा है। प्रदेश में अभी भी बड़े पैमाने पर ऊसर-बंजर-बीहड़ व जलमग्न भूमि है, जिसे खेती लायक बनाने की जरूरत है। योजना खत्म होने जा रही है लेकिन कोई नया प्रोजेक्ट मंजूर नहीं होने तथा सरकार से आॢथक सहायता नहीं मिल पाने से स्थितियां खराब होती जा रही है।

वर्षों से चल रही है योजना

ऊसर भूमि को सुधारने के उद्देश्य से वर्ष 1978 में स्थापित उप्र भूमि सुधार निगम ने वर्ष 1993 में विश्व बैंक के सहयोग से 10 और यूरोपियन यूनियन के सहयोग से पांच जनपदों में योजना लागू की। प्रथम चरण वर्ष 1993-1999 में एक लाख हेक्टेयर भूमि सुधारी गई और लगभग 2.50 लाख किसान लाभांवित हुये। द्वितीय चरण 1999-2007 में यह योजना प्रदेश के 18 जनपदों में लागू कर 1.50 लाख हेक्टेयर ऊसर भूमि सुधारी गई और तीन लाख किसान लाभांवित हुए।

प्रदेश के 30 जनपदों को मिला लाभ

तृतीय चरण वर्ष 2009-2018 में इस योजना को प्रदेश के 30 जनपदों में लागू किया गया। अब तक 1.30 लाख हेक्टेयर ऊसर भूमि सुधारी जा चुकी है। 31 दिसम्बर 2018 को योजना की पूर्व निर्धारित अवधि समाप्त होनी है लेकिन, योजना अवधि विस्तारीकरण या अन्य प्रोजेक्ट हासिल करने के प्रति निगम प्रबंध तंत्र का उपेक्षित रवैया बरकरार है।

योजना को नहीं पहनाया गया अमलीजामा

27 फरवरी 2018 को कृषि उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता में संपन्न हुई निगम के निदेशक मण्डल की 115वीं बैठक में विश्व बैंक से पोषित परियोजना की अवधि पूरी होने से पूर्व निगम हित में बाहरी सहायता से संचालित कृषि आधारित नयी परियोजना के संबंध में कांसेप्ट पेपर पर अनुमोदन प्रदान करते हुये विश्व बैंक को भेजने पर निदेशक मण्डल ने सहमति प्रदान की। इस परियोजना की संचालन अवधि वर्ष 2018-19 से 2024-29 तक प्रस्तावित की गयी थी। लेकिन, इस योजना को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका।

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