मातृसत्ता की ताकत को दर्शाता है ऐतिहासिक इमा बाजार

क्या आप कल्पना कर सकते हैं किसी ऐसे बाजार की जहां सिर्फ महिलाएं विक्रेता हों और खरीदार कोई भी। जिस बाजार में एक साथ चार हजार महिलाएं दुकान लगाए बैठी हों। हमने कई तरह के बाजारों का जिक्र इतिहास में भी सुना था। मीना बाजार सबसे लोकप्रिय था जो किला के भीतर या उसके आसपास लगता था, जहां सिर्फ स्त्रियां दुकान लगाती थीं, वे ही खरीदारी करने जा सकती थीं या शहजादियां। उनकी जरूरत कालांतर में इस बाजार में कई कुरीतियां आईं, विवाद हुए और वह नष्ट हो गया, लेकिन मणिपुर में 500 साल से लगने वाला इमा बाजार आज तक चल रहा है, मातृसत्ता के जबरदस्त प्रभाव के रूप में इसे देखा जाना चाहिए। इंफाल स्थित महिलाओं के उस बाजार में प्रवेश करते ही आंखें चौंधिया गईं थीं, कई कारणों से। शुरुआत कहीं से तो करनी थी। मैं सामानों की तरफ इशारा करके उसका मूल्य पूछ रही थी। वह बूढी औरत कुछ समझ नहीं पा रही थी। उसने मुझे लगभग इगनोर कर दिया। पीछे से किसी स्त्री की आवाज आई- आपको यहां शॉपिंग करनी है तो दुकान पर बैठी स्त्रियों को ‘इमा’ बोलो। फिर देखो…! इमा का रिस्पेक्ट जरुरी है।
पीछे एक मणिपुरी युवती खड़ी थी, अपने पारंपरिक परिधान में। उसके साफ हिंदी बोलने पर मैं गदगद होने ही वाली थी कि उसने कहा- मैं दिल्ली में पढ़ी हूं, हिंदी लिख-पढ़ लेती हूं। यहां बाजार में बूढी औरतें हिंदी नहीं समझती, मगर युवा लड़कियां आठवीं तक हिंदी पढ़ीं हैं, उनसे मदद लो आप..! मुझे रास्ता बताते हुए वह बाला बाजार की भीड़ में खो गई। मेरे साथ आए स्थानीय गाइड हेनरी कहीं पीछे छूट चुका था। हेनरी का नाम मैने ओ हेनरी कर दिया था और उसे हमारा पूरा ग्रुप ‘लास्ट लीफ’बुलाने लगा था। मैने हेनरी को खोजा। फिर याद आया कि हेनरी के अनुसार इमा का अर्थ ‘मां’ होता है।
वह लडक़ी जाते-जाते बता गई थी कि दुकानदार स्त्रियों से कैसे बात करनी है। मुझे ये नहीं अंदाजा था कि वह फायदेमंद मंत्र दे गई थी जिसके सहारे बाजार में जमकर छूट मिलती है। मैंने शुष्क बूढ़ी औरत को कहा -‘इमा’, वो मफलर कितने का ? उसने इमा सुनते ही जो कहा, मैं हैरान। ‘बेटी’ लो … ! मतलब इतनी हिंदी तो जानती ही है कि स्त्री ग्राहक को कहां रोक लेना है। उसका तना हुआ चेहरा ढीला पड़ा। माथे पर चंदन की लंबी लकीरें थीं।
उसने दाम बताए और अच्छी खासी छूट भी दी। मुझे शॉपिंग मंत्र मिल गया था। चार हजार स्त्रियों के बाजार में सारी ‘इमा’ निकलीं और हम बेटियां। बाजार में भीतर धंसते हुए जिसे मैं हैलो इमा कहती, वो कहती- बेटी, बेटी.. ’वो फिर माएं थीं जो इमा सुनते ही मुस्कुरा पड़तीं और जिनके सूखे चेहरे पर सहजता आ जाती थी। मैं इंफाल के ऐतिहासिक ‘इमा मार्केट , इमा कैथल’ के बारे में बात कर रही हूं, जिसे मदर्स मार्केट के नाम से भी जाना जाता है। इस बाजार की भी एक दिलचस्प कहानी है।
बताते हैं कि 16वीं शताब्दी में जब यहां राजा का शासन था तब अधिकांश पुरुष सेना में भर्ती होते थे या उन्हें चावल की खेती करने के लिए दूर दराज के इलाकों में भेज दिया जाता था। ऐसे में बाजार सूने। न कोई विक्रेता न कोई खरीदार। ऐसी स्थिति में महिलाओं को ही बाकी काम करने पड़ते थे। उन्हें घर से निकल कर बाहर का मोर्चा संभालना पड़ता था। सन 1533 में इस बाजार की नींव रखी गई थी। ऐसा बाज़ार सिर्फ मणिपुर की राजधानी इंफाल में ही नहीं , सूबे के हरेक जिले में , बड़े शहरों में मिलेगा। हर जगह एक इमा मार्केट है जिसकी जड़ें इतिहास में धंसी हैं। ज्यादातर महिलाओं के लिए युद्धकाल का मतलब परेशानी, परिवार को अकेले संभालना और राशन साझा करना था।
ऐसी ही आवश्यकताओं ने हमेशा स्त्रियों को मुक्त किया है। इतिहास गवाह है कि दूसरे विश्वयुद्ध के समय जब सारे पुरुष मोर्चे पर चले गए तब स्त्रियों ने ही सारा कार्य-व्यापार संभाला था। दफ्तरों में घुसकर काम किए। जब पुरुष मोर्चे से वापस लौटे तो स्त्रियों ने कदम पीछे करने से इनकार कर दिया। उन्होंने साबित कर दिया था कि आवश्यकता पडऩे पर सारे काम कर सकती हैं। व्यापार भी उनमें से एक है।
मणिपुर का समाज 500 साल पहले अपनी स्त्रियों को मुक्त कर चुका था, वजह एक ही होती है, मुक्ति का देशकाल अलग।
तब से आजतक इमार बाजार की परिपाटी नहीं बदली। यहां सिर्फ शादीशुदा स्त्रियां ही व्यापार कर सकती हैं। उनकी जगहें तय हैं जहां वे पिछले कई दशकों से बैठती चली आ रही हैं। मां अपनी बेटी को विरासत सौंपती चली आ रही है। पांच सौ साल से यही रिवाज चला आ रहा है।
यह बाज़ार नहीं परंपरा है। मेरी मां ने मुझे सौंपा है यह काम। आगे मैं अपनी बेटी को सौंपूंगी मगर शादी के बाद। युवा दुकानदार राजेश्वरी तुतलाती हिंदी में बताती हैं कि इस बाजार पर मातृसत्ता कायम है, जिसे कोई नियम कानून बदल नहीं सकता। वहीं 70 साल की वेदमणि को चिंता है कि उनके बाद इस परंपरा को आगे कौन बढ़ाएगा। इकलौती बेटी प्रदेश छोड़ कर विदेश चली गई है और उसे ये काम पसंद नहीं। वेदमणि अपनी विरासत सौंपने के लिए उचित पात्र ढूंढ रही हैं। हालांकि ढेरों बेरोजगार युवक दुकान लगाने को बेताब घूम रहे हैं। लेकिन उन्हें दुकान लगाने का हक नहीं है। पितृसत्ता इस बाजार से पूरी तरह अपदस्थ है। यहां जिन महिलाओं को बाजार की इमारत के अंदर जगह नहीं मिली है, वे दैनिक आवश्यकताओं से जुड़ी चीजें बाहर पटरियों पर बैठ कर बेचती हैं। इसलिए अगर मणिपुर की यात्रा पर जा रहे हैं तो इमा बाजार की सैर के बिना आपकी यात्रा अधूरी रहेगी। महिला व्यापारियों को आदर से ‘ इमा’ कहिए, चाहे वे युवा ही क्यों न हो, बदले में सामान, मुस्कान और भारी छूट पाइए। तुतलाती हुई हिंदी की मिठास यात्रा की थकान दूर कर देगी। यकीन मानिए… ऐतिहासिक इमारत के भीतर बसे बाजार में ‘इमाएं’ शोर नहीं मचाती!

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