अच्छे शासन के मानदंडों की धज्जी उड़ाता यूपी

एन के सिंह

गोकशी की अफवाह के चलते अराजक हिन्दू संगठनों की भीड़ ने बुलंदशहर में एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या कर दी। जबकि एक सिपाही जख्मी है। ऐसी ही भीड़ ने कुछ दिनों पहले दिल्ली से सटे गौतमबुद्धनगर के बिसहरा गांव में अखलाक को इसी अफवाह के चलते मार दिया था। कुछ माह पहले उधर यूपी पुलिस के एक सिपाही ने तथाकथित चेकिंग के दौरान प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक मल्टीनेशनल कंपनी के मैनेजर को गोली मार दी थी। बुलंदशहर की घटना में आरोप है कि इंस्पेक्टर के साथी हमला देख कर भाग खड़े हुए जबकि लखनऊ की घटना में उस सिपाही की उस आपराधिक कृत्य पर कार्रवाई के खिलाफ पुलिस का सामूहिक दबाव देखने में आया। अगर ट्रेनिंग सही होती तो स्थिति उल्टी होती। इंस्पेक्टर को बचाने के लिये सभी सिपाही जान पर खेल जाते। देखने में ये तीनों घटनाएं गैर-सम्बद्ध और विपरीत लगती हैं लेकिन गहरे विश्लेषण से पता चलेगा कि इनमें एक घनिष्ट रिश्ता है।
राज्य और उसके अभिकरणों की संवैधानिक व्यवस्था के तहत निश्चित परिमाण में एक भूमिका होती है उसे कम या ज्यादा करना कई समस्याओं को जन्म देता है। अगर राजनीतिक आकाओं के इशारे पर कोई बड़ा पुलिस अधिकारी राम या शिव-भक्त कावडिय़ों पर पुष्प-पंखुडियां बरसायेगा तो उन्हीं भक्तों में कुछ अगले पड़ाव पर किसी ट्रैफिक के सिपाही को पीट-पीट कर मार सकते हैं या सडक़ पर जा रहे वाहन को आग लगा सकते है। गौ-रक्षक अगर शासन और उसके एजेंसियों की नजरों में भी पूज्यनीय है तो बुलंदशहर की घटना उसकी तार्किक परिणति। दरअसल उद्दंड गौ-भक्त या उतने हीं आक्रामक ओबैसी-समर्थक जानते हैं कि अगले चुनाव में उन्हीं में से किसी को टिकट मिलेगा और वह जन-उन्माद के बहाव में जीत कर देश या प्रदेश का कानून भी बनाएगा और मंत्री बन संविधान में निष्ठा की शपथ भी लेगा।
गोकशी के खिलाफ सत्ताधारी दल और उसके सभी सम्बद्ध संगठन दिन-रात बयान देते हैं। इन बयानों के तहत जो भी दुस्साहस के साथ कानून हाथ में लेते हुए हिंसा करता है वह यह जानता है कि कानून भी सत्ता का इशारा समझता है तभी तो पुलिस का शीर्ष अफसर फूल बरसता है। तमाम अफसर समाज के एक वर्ग के लम्पटीकरण के कारक राजनीतिक, सामाजिक व कई बार आर्थिक होते हैं और राज्य अभिकरणों की भूमिका उन्हें रोकने में घूमिल पड़ जाती है। लेकिन जब इन अभिकरणों का लम्पटीकरण होने लगता है तो शायद संविधान, कानून, सिस्टम और प्रजातंत्र सब बेमानी हो कर टुकुर-टुकुर देखने के सिवा कुछ नहीं कर सकते। उत्तर प्रदेश में 2017 के चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ जैसे कि 2014 में देश में हुआ था। शुरू में लगा कि एक बेबाक ‘गेरुआ संत का’ नेतृत्व भले हीं विचारधारा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता रखता हो, गवर्नेंस में आने की बाद कल्याणकारी राज्य के मूल्यों के प्रति अपनी श्रद्धा को सभी प्राथमिकताओं से ऊपर रखेगा। लिहाजा या तो योगी के रूप में मुख्यमंत्री सक्षम नहीं हैं या उनकी क्षमता पर ‘अन्य ताकतों’ ने ग्रहण लगा दिया है। नतीजा यह रहा कि जहां राज्य की व्यवस्था बनाये रखने वाली पुलिस नृशंस और अमानवीय होती गयी, वहीं विकास में लगी एजेंसियां, फर्जी आंकड़े जुटाने में और हकीकत छुपाने में लग गयीं और मोदी-योगी का ‘इकबाल’ इस नयी ‘अमानवीय, रीढ़-विहीन लिहाडा फरेबी’ ब्यूरोक्रेसी की बेदी पर दम तोडऩे लगा है।
ताजा खबर के अनुसार केंद्र सरकार की पहल पर की गयी एक जांच में उत्तर प्रदेश के 1.88 लाख आगनबाड़ी केन्द्रों में इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम में पंजीकृत बच्चों में 14.57 लाख बच्चे इस दुनिया कभी आये हीं नहीं, गर्भ में भी नहीं। लेकिन तमाम वर्षों से और आज भी हर रोज इन बच्चों के नाम मिलने वाला आठ रुपया अफसरशाही उदरस्थ कर लेता है याने हर वर्ष हजारों करोड़। यही वजह है कि बाल मृत्यु दर उत्तर प्रदेश और बिहार में नीचे आने का नाम हीं नहीं ले रही है। मोदी के वायदे ‘सबको स्वास्थ्य’ को चूना लगाने वाले ये आईएएस अफसर जिलों में या विकास प्राधिकरणों में हीं नहीं सभी महत्वपूर्ण विकास करने वाले विभागों पर कुंडली मार कर बैठे रहते हैं।
कहते हैं चावल का एक दाना देखने से हीं पूरी भात के पकने का जायजा लिया जा सकता है. उत्तर प्रदेश में आज योगी शासन के एक साल के बाद शासन के स्थिति देखने के लिए कुछ घटनाएं और उनके विश्लेषण काफी हैं।
अभी भी समय है। अगर प्रदेशों में भाजपा की सरकारें भावनात्मक मुद्दे पर ध्यान लगाने के बजाय पक्षपात-शून्य ‘गवर्नेंस’ पर लग जाएं तो न तो बुलंदशहर में कोई पुलिस इंस्पेक्टर मारा जाएगा न हीं लखनऊ में कोई कार-यात्री गुस्से में आप खोये किसी सिपाही की गोली का शिकार होगा। अगर राज्य की पुलिस को शिव-भक्त कांवडिय़ों पर हेलिकॉप्टर से फूल बरसाने की बाध्यता हो तो ‘इस्तमा’ में देश के कोने-कोने से आये आठ लाख मुसलमानों जायरीनों पर भी यही भाव रखना होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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