सभ्य संवाद की कला को मरने न दें

पवन के वर्मा

हमारे सार्वजनिक विमर्श के साथ कहीं गहराई से कुछ गलत है। इसमें कुछ ऐसी अशिष्टता व्याप्त हो गयी है, जो विश्व की सबसे पुरानी तथा सबसे सुसंस्कृत सभ्यताओं में एक होने के हमारे दावे की पुष्टि नहीं करती। हम लोग एक-दूसरे से नहीं, एक-दूसरे के बारे में बातें करते हैं, जिनमें दुर्वचनों, लांछन, द्वेष, इशारेबाजी एवं अनुचित निंदा की भरमार हुआ करती है।
समाज में एक किस्म का अतिवाद हावी है, जो हर किसी चीज पर श्वेत अथवा श्याम का ठप्पा लगाकर इन दोनों के बीच की सारी उभयनिष्ठताओं या संदेहों अथवा दूसरे के नजरिये के भी उतने ही सही होने की सारी संभावनाओं को सिरे से नकार देता है। संक्षेप में, विश्व के इस सबसे पुराने लोकतंत्र में सभ्य संवादों की महान कला विलुप्त हो गयी लगती है। जबकि ब्रह्मसूत्र, जो उपनिषद तथा गीता के साथ हिंदुत्व के तीन आधारभूत ग्रंथों में एक रहा है, अपने आप में एक संवाद तो नहीं है, पर उस पर लिखी गयी विस्तृत टीकाएं अथवा भाष्य संवाद ही हैं। इनमें से शंकराचार्य द्वारा लिखित आधारभूत टीका तो अनिवार्य रूप से उनके ‘विपक्षी’ या उनसे असहमत दृष्टिकोण को भी शामिल करती चलती है।
हमारी सभ्यता के इतिहास का यह संवादात्मक पहलू सिर्फ प्राचीन भारत तक ही सीमित नहीं है। मुगल शासक अकबर ने अपने संवादपरक मंच दीन-ए-इलाही के तत्वावधान में चर्चाओं की एक शृंखला शुरू की, जिनमें इस्लाम के समर्थकों को अन्य धर्मावलंबियों के दृष्टिकोणों का सामना करना होता था। इसका अंतिम उद्देश्य उनके मध्य संश्लेषण का एक ऐसा मिलन बिंदु तलाशना था, जिसके अंतर्गत सभी धर्मों का सर्वोत्तम समाहित हो सके। हाल के युग में हमारा स्वतंत्रता आंदोलन सभ्य संवाद की महत्ता का एक ज्वलंत उदाहरण रहा है। नेहरू तथा गांधी द्वारा एक-दूसरे को लिखे गये पत्रों से यह स्पष्ट होता है कि दोनों के बीच कितने मुख्य मुद्दों पर असहमति थी। पर उन्हें खुलकर व्यक्त करते हुए भी वे एक-दूसरे के प्रति अत्यंत सम्मान प्रदर्शित करते थे। नेहरू तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पत्रों से भी यही प्रकट होता है। किसी से बिल्कुल असहमत होते हुए भी इस शिष्टता, भावनाओं की इस उदारता, दूसरे की बातें ससम्मान सुनने की इस सामथ्र्य को अब क्या हो गया? आज के सार्वजनिक जीवन के लोगों से हमें जिस किस्म की घटिया शब्दावली सुनने को मिलती है, वह शर्मनाक से कुछ भी कम नहीं है।
भाषा और तथ्यों की प्रामाणिकता से परे बस एक ही उद्देश्य रह गया है कि विपक्षी पर तात्कालिक प्रहार दर्ज किया जाये। क्या हमारे नेता असुरक्षा के किसी अदम्य भाव से ग्रस्त हैं, जो हर बार चुनाव के निकट आ जाने पर यह स्पष्टत: साफ हो उठती है? अथवा क्या इस दौर के लिए ऐसी ही चर्चा मौजूं है? क्या इस प्रवृत्ति पर राजनीतिक पर्यवेक्षण का अभाव है? अथवा इससे भी बढक़र, जो अपने अधीनस्थों की ऐसी हरकतें रोकने के जिम्मेदार हैं, कहीं इसमें उनकी ही संलिप्तता तो नहीं है?
इस स्थिति का सबसे बुरा पहलू यह है कि एक गरिमाविहीन कटाक्ष अपनी ही कोटि के दूसरे ताने को जन्म देता चला जाता है और अंतत: पूरा राष्ट्रीय विमर्श एक भाषायी अराजकता का बंधक-सा बन जाता है। फिर हमारे टीवी चैनल भी यही करने लगते हैं अथवा इसे यों कहें कि संभवत: टीवी चर्चा ही पूरे विमर्श को प्रभावित करने लगती है।
ऐसे बहुत कम टीवी चैनल हैं, जिनमें कोई दर्शक एक सभ्य चर्चा देख सकता है वरना उनमें से अधिकतर तो चीखने की किसी स्पर्धा के शिकार बन गये लगते हैं। सोशल मीडिया ने सार्वजनिक बहस का लोकतंत्रीकरण तो किया है, मगर उसने दुर्वचनों को भी वैधानिकता प्रदान कर दी है। किसी व्यक्ति के मोबाइल फोन पर दबाया गया एक बटन साइबर स्पेस में गंदी गालियां तथा निंदाएं भेजकर एक घृणा अभियान आरंभ कर सकता है, जिसे प्रसारित करने में कई निंदक सेनाएं लग जा सकती हैं। यह रोग संक्रामक है। पर इस स्थिति के कुछ ऐसे भी सम्माननीय अपवाद हैं, जिनकी तारीफ की जानी चाहिए। नीतीश कुमार एक ऐसे ही व्यक्ति हैं, मैं जिनका उल्लेख केवल इसलिए नहीं कर रहा कि मैं भी उसी पार्टी का एक सदस्य हूं।
मैंने उन्हें एक बार भी अमर्यादित भाषा का व्यवहार करते नहीं देखा। ऐसे उदाहरण अनुकरणीय हैं। हममें से प्रत्येक व्यक्ति को सार्वजनिक विमर्श के नाम पर की जानेवाली अभद्रता की इस अंतहीन यात्रा पर आगे बढ़ते जाने से पूर्व इस पर सोचने की जरूरत है कि इस दिशा में क्या किया जा सकता है। व्यक्तिगत स्तर पर मैंने कुछ अन्य व्यक्तियों के साथ ‘शास्त्रार्थ’ नामक एक सार्वजनिक मंच स्थापित किया है, जिसका एकमात्र उद्देश्य सार्वजनिक कार्यक्रमों के माध्यम से सभ्य संवाद की मृतप्राय कला को पुनर्जीवन प्रदान करना है।

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